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अनिल चमड़िया

आंकड़ों में फंसी पत्रकारिता, तस्करी में 'अव्वल भारत' और बाघ संरक्षण की 'हकीकत'

आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित पत्रकारिता एक नई पद्धति है. सूचना क्रांति का यह दौर, सूचनाओं के अधार पर एक और नई सूचना निर्मित करने और इसे एक नए आवरण में प्रस्तुत करने के सिद्धांत पर आधारित समझा जाता है. सूचना क्रांति के दौर में खबरदाता की खामोशी बढ़ती गई है. सूचनाओं के आंकड़ों पर आधारित पत्रकारिता में खबर बनाने और खबर को झुठलाने की कौशलता के बीच एक युद्ध चलता है. पाठक, दर्शक और श्रोता इन दो पक्षों में एक को सुनने के लिए स्वतंत्र है. यह युद्ध पाठक, दर्शक और श्रोता की इस स्वतंत्रता को जीतने का लक्ष्य लिए है. 

बाघों के अंगों के आंकड़ों से खेलने की पत्रकारिता 

देश के एक प्रमुख हिन्दी दैनिक अखबार ‘राजस्थान पत्रिका’ में 9 नवंबर 2022 को ‘भारत बाघों की तस्करी का गढ़’ शीर्षक से एक सूचना प्रमुखता से प्रकाशित हुई. खबर को उसी रूप में यहां प्रस्तुत किया जा रहा है.

राजस्थान पत्रिका का लेख

खबर के प्रकाशित होने के बाद भारत सरकार के प्रेस सूचना कार्यालय ने 10 नवंबर को प्रकाशित सामग्री का खंडन जारी किया. उसे भी यहां प्रस्तुत किया जा रहा है. 

‘राजस्थान पत्रिका’ में 09 नवंबर 2022 को “भारत बाघों की तस्करी का गढ़” शीर्षक से प्रकाशित समाचार का खंडन

“राजस्थान पत्रिका में 9 नवंबर, 2022 को “भारत बाघों की तस्करी का गढ़” शीर्षक से एक समाचार प्रकाशित किया गया है. महज सनसनीखेज समाचार बनाने के इरादे से प्रकाशित की गई उक्त समाचार रिपोर्ट गलत तथ्यों, आंकड़ों और भ्रामक सूचनाओं पर आधारित है. यह समाचार कुछ ऐसी रिपोर्ट्स पर निर्भर हैं, जो जब्ती से संबंधित रिपोर्ट किए गए आंकड़े सही हैं और जब्त किए गए बाघ के हिस्से, बाघों की मृत्यु का आंकड़ा निकालने की दृष्टि से प्रामाणिक हैं जैसी अवास्तविक धारणाओं पर आधारित हैं. 

ये धारणाएं इस वजह से त्रुटिपूर्ण हैं कि भारत में कुछ ऐसे समुदाय हैं. जो पशुओं की हड्डियों का उपयोग करके बाघ के नकली पंजे बनाने में माहिर हैं. डीएनए आधारित तकनीकों का उपयोग करके वास्तविकता की पुष्टि किए बिना पंजे जैसी जब्त सामग्री को बाघ के रूप में गिनने से अक्सर बाघों की मौत की संख्या बढ़ जाती है. बाघ संरक्षण के लिए भारत सरकार के प्रयासों को बदनाम करने के लिए निहित स्वार्थों द्वारा ऐसी रिपोर्ट आधी-अधूरी सूचनाओं के साथ प्रकाशित की जाती है.

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) द्वारा बाघों की मृत्यु दर के व्यवस्थित आंकड़े सिर्फ वर्ष 2012 से ही संग्रहित किए जा रहे हैं और 2012 से पहले बाघों की मृत्यु दर के विवरण को उद्धृत करने वाली कोई भी रिपोर्ट अप्रमाणित तथ्यों/धारणाओं और सुनी -सुनाई साक्ष्यों पर ही निर्भर होगी.

वर्ष 2017-2021 की अवधि के दौरान, एनटीसीए ने 547 बाघों की मृत्यु दर्ज की है. जिनमें से 393 बाघ प्राकृतिक कारण, 154 मामले विषाक्तता (25), फंदे में फंसने (9), गोलीबारी/उन्मूलन (7) के साथ दौरे (55), बिजली का झटका (22) और अवैध शिकार (33) के रूप में दर्ज मामले से संबंधित हैं. सख्त अर्थों में बाघों की मौत, जिसके लिए शरीर के अंगों और अवैध वन्यजीव व्यापार के उद्देश्य से किए गए अवैध शिकार को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, कि वास्तविक संख्या 88 है, जोकि पिछले पांच वर्षों के दौरान दर्ज की गई बाघों की मृत्यु की कुल संख्या का 16 प्रतिशत है.

बाघों से संबंधित अखिल भारतीय अनुमान, जो कि बाघों, सहयोगी परभक्षियों और उनके शिकार आधार के लिए एक विज्ञान आधारित निगरानी कार्यक्रम है और जिसे 2006 से लागू किया जा रहा है, ने भारतीय बाघों की वृद्धि दर छह प्रतिशत प्रतिवर्ष होने का अनुमान लगाया है. बाघों की आबादी की यह प्राकृतिक वृद्धि दर अवैध शिकार सहित विभिन्न कारणों से बाघों की मृत्यु दर को कम कर देती है. इसके अलावा, उच्च बाघ घनत्व वाले क्षेत्रों में उच्च मृत्यु दर्ज की जाती है क्योंकि स्वाभाविक प्राकृतिक प्रक्रियाएं मौजूद होती हैं.

बाघों की मृत्यु दर्ज करने के लिए, एनटीसीए ने कड़े मानक स्थापित किए हैं और ऐसा करने वाला शायद दुनिया का बाघों की उपस्थिति वाला एकमात्र देश है. बाघ के शव के निपटान के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) विकसित की गई है, जिसमें पोस्टमॉर्टम की निगरानी के लिए एक समिति का गठन और बाद में शव को जलाकर निपटाना शामिल है. आंत के अंगों को फोरेंसिक जांच के लिए संरक्षित किया जाता है. बाघ अभयारण्यों / बाघों की उपस्थिति वाले राज्यों द्वारा प्रस्तुत विस्तृत अंतिम रिपोर्ट, सहयोगी साक्ष्यों/दस्तावेजों के आधार पर एनटीसीए में बाघ की मौत के कारण का पता लगाया जाता है और मृत्यु के मामले को तदनुसार बंद किया जाता है.

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत प्रोजेक्ट टाइगर डिवीजन और एनटीसीए कानून प्रवर्तन और उन्नत तकनीकी उपकरणों का उपयोग करके बाघ अभयारण्यों की बढ़ी हुई सुरक्षा के माध्यम से बाघ, जोकि भारत की अनूठी वन्यजीव प्रजातियों में शामिल है, की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं". 

राजस्थान पत्रिका ने अपने पाठकों को पहले भारत के बाघों की तस्करी के गढ़ बनने की कहानी प्रस्तुत की. दूसरे दिन भारत सरकार ने उस कहानी को गलत और भ्रामक साबित करने के लिए आंकड़ों के विश्लेषण की अपनी कौशलता को राजस्थान पत्रिका वे दूसरे जन संचार माध्यमों के पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों के समक्ष जाहिर कर दिया. 

सूचनात्मक आंकड़ों का एक व्यवस्थित ढांचा विकसित हुआ है. आंकड़ों के व्यवस्थित ढांचे ने पत्रकारिता को गहरे और बड़े स्तर पर प्रभावित किया है. 

जीव-जन्तुओं के अंगों की तस्करी और व्यापार

जीव-जन्तुओं के अंगों की तस्करी और व्यापार दो भिन्न दृष्टि के परिचायक हैं. तस्करी को स्थापित कानूनी ढांचे के सामानांतर ढांचे की प्रक्रिया माना जाता है. व्यापार को वैध माना जाता है. अंतर्राष्ट्रीय संगठन ट्रैफिक ब्रिटेन स्थित एक पंजीकृत संस्था है और वह जीव-जन्तुओं के अंगों के वैध व्यापार की पक्षधर है. यह संस्था प्रत्येक वर्ष जीव-जन्तुओं के अंगों पर अपनी रिपोर्ट जारी करती है. इस संस्था के उद्देश्यों में पूरी दुनिया में पत्रकारिता को भी प्रभावित करना है. भारत में जिस तरह से ‘ट्रैफिक’ की स्किन एंड बोन्स रिपोर्ट पर आधारित सूचनाएं प्रकाशित और प्रसारित की गई. संभव है कि चीन और दूसरे मुल्कों में स्थित जन संचार माध्यमों ने अपने ‘राष्ट्रीय’ मानस के लिए भी ट्रैफिक की स्किन एंड बोन्स रिपोर्ट की सूचनाएं प्रकाशित और प्रसारित की हों. 

भारत में ट्रैफिक की स्किन एंड बोन्स रिपोर्ट

भारत में ट्रैफिक कि स्किन एंड बोन्स रिपोर्ट में बाघों के अंगों के बारे में सूचनाओं को अंगों की तस्करी के रूप में जन संचार माध्यमों ने प्रकाशित व प्रसारित किया है. ट्रैफिक की स्किन एंड बोन्स रिपोर्ट के अंशों के 9 नवंबर 2022 को राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित होने के अलावा जो प्रकाशन व प्रसारण हुए हैं. उसका ब्यौरा इस प्रकार है.    

  1. भारत बना बाघों की तस्करी का गढ़, स्किन एंड बोन्स रिपोर्ट में हुआ खुलासा... - YouTube

  2. बाघों के अंगों की तस्करी में अव्वल है भारत, चीन है बहुत पीछे (downtoearth.org.in)

3 नवंबर 2022 को डाउन टू अर्थ में प्रकाशित रिपोर्ट के अंशों व उसकी भाषा और अन्य प्रकाशनों व प्रसारणों की भाषा की भी तुलना की जा सकती है. डाउन टू अर्थ में रिपोर्ट को इस तरह प्रस्तुत किया गया है:-

बाघों के अंगों की तस्करी में अव्वल है भारत, चीन है बहुत पीछे

23 वर्षों में बाघों की अवैध तस्करी की दुनिया भर में कुल 2,205 घटनाएं सामने आई हैं. जिनमें से 34 फीसदी यानी 759 घटनाएं अकेले भारत में दर्ज की गई हैं. एक तरफ देश में जहां बाघों को बचाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं. वहीं साथ ही भारत में इनका अवैध व्यापार भी फल-फूल रहा है. पिछले 23 वर्षों में इनकी अवैध तस्करी की दुनिया भर में कुल 2,205 घटनाएं सामने आई हैं. जिनमें से 34 फीसदी यानी 759 घटनाएं अकेले भारत में दर्ज की गई हैं. जो 893 यानी जब्त किए गए 26 फीसदी बाघों के बराबर है. इसके बाद 212 घटनाएं चीन में जबकि 207 मतलब नौ फीसदी इंडोनेशिया में दर्ज की गई हैं.

इस बारे में अंतराष्ट्रीय संगठन ट्रैफिक द्वारा जारी नई रिपोर्ट “स्किन एंड बोन्स” के अनुसार संरक्षण के प्रयासों को कमजोर करते हुए, शिकारी बाघों को उनकी त्वचा, हड्डियों और शरीर के अन्य अंगों के लिए निशाना बना रहे हैं. रिपोर्ट की मानें तो पिछले 23 वर्षों में औसतन हर साल करीब 150 बाघों और उनके अंगों को अवैध तस्करी के दौरान जब्त किया गया है.

रिपोर्ट के अनुसार पिछले 23 वर्षों में जनवरी 2000 से जून 2022 के बीच 50 देशों और क्षेत्रों में बाघों और उनके अंगों की तस्करी की यह जो घटनाएं सामने आई हैं उनमें कुल 3,377 बाघों के बराबर अंगों की तस्करी की गई है. गौरतलब है कि दुनिया में अब केवल 4,500 बाघ ही बचे हैं, जिनमें से 2,967 भारत में हैं. अनुमान है कि 20वीं सदी के आरंभ में इनकी संख्या एक लाख से ज्यादा थी.

ऐसे में यदि इसी तरह उनका शिकार और तस्करी होती रही तो यह दिन दूर नहीं जब दुनिया में यह विशाल बिल्ली प्रजाति जल्द ही विलुप्त हो जाएगी. गौरतलब है कि इनकी बरामदगी 50 देशों और क्षेत्रों से हुई है, लेकिन इसमें एक बड़ी हिस्सेदारी उन 13 देशों की थी, जहां अभी भी बाघ जंगलों में देखे जा सकते हैं.

रिपोर्ट से पता चला है कि पिछले 23 वर्षों में तस्करी की जितनी घटनाएं सामने आई हैं उनमें से 902 घटनाओं में बाघ की खाल बरामद की गई थी. इसके बाद 608 घटनाओं में पूरे बाघ और 411 घटनाओं में उनकी हड्डियां बरामद की गई थी.

ट्रैफिक ने आगाह किया कि है कि बरामदी की यह घटनाएं बड़े पैमाने पर होते इनके अवैध व्यापार को दर्शाती हैं लेकिन यह इनके अवैध व्यापार की पूरी तस्वीर नहीं है क्योंकि बहुत से मामलों में यह घटनाएं सामने ही नहीं आती हैं.

2018 के बाद से भारत और वियतनाम में बरामदगी की घटनाओं में दर्ज की गई है वृद्धि

हालांकि रिपोर्ट की मानें तो 2018 के बाद से बाघों और उनके अंगों की बरामदी की घटनाओं में कमी आई है, लेकिन इसके बावजूद भारत और वियतनाम में इस तरह की घटनाओं में वृद्धि दर्ज की गई है. पता चला है कि पिछले चार वर्षों में वियतनाम में बरामदी की इन घटनाओं में 185 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है.

वहीं ट्रैफिक ने जानकारी दी है कि थाईलैंड और वियतनाम में जब्त किए गए अधिकांश बाघों को संरक्षण के लिए रखी गई सुविधाओं से प्राप्त होने का संदेह है, जो दर्शाता है कि बाघों और उनके अंगों के अवैध व्यापार को बढ़ावा देने में इन बंदी सुविधाओं की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता. पता चला है कि थाईलैंड में जितनी बरामदगी हुई है, उनमें से 81 फीसदी बाघ बंदी सुविधाओं जैसे चिड़ियाघर, प्रजनन फार्म आदि से जुड़े थे जबकि वियतनाम में यह आंकड़ा 67 फीसदी था.

रिपोर्ट में जो आंकड़े सामने आए हैं उनके अनुसार 2022 की पहली छमाही में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है. इस दौरान इंडोनेशिया, थाईलैंड और रूस ने पिछले दो दशकों में जनवरी से जून की तुलना में बरामदी की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है. अकेले इंडोनेशिया में 2022 के पहले छह महीनों में करीब 18 बाघों के बराबर अवैध तस्करी की घटनाएं सामने आई हैं. जो 2021 में सामने आई तस्करी किए बाघों की कुल संख्या से भी ज्यादा है.

इतना ही नहीं ट्रैफिक ने दक्षिण पूर्व एशिया में बाघों और उनके अंगों की तस्करी में शामिल 675 सोशल मीडिया खातों की भी पहचान की है, जो दर्शाता है कि संकट ग्रस्त प्रजाति का अवैध व्यापार अब ऑनलाइन भी तेजी से फैल रहा है. आंकड़ों से सामने आया है कि इनमें से लगभग 75 फीसदी खाते वियतनाम में आधारित थे. ऐसे में इनके संरक्षण को लेकर दुनियाभर में जो प्रयास किए जा रहे हैं, वो कैसे सफल होंगें यह एक बड़ा सवाल है.

इस बारे में रिपोर्ट की सह-लेखक और दक्षिण पूर्व एशिया में ट्रैफिक की निदेशक कनिथा कृष्णासामी का कहना है कि “यदि हम अपने जीवनकाल में जंगली बाघों को खत्म होते नहीं देखना चाहते, तो इस बारे में तत्काल और समयबद्ध कार्रवाई को प्राथमिकता देनी होगी.“

प्रति वर्ष की खबरें

आंकड़ों के व्यवस्थित ढांचे की संस्थाओं का पूरी दुनिया में तेजी से विस्तार हुआ है. जन संचार माध्यमों में हर वर्ष विभिन्न क्षेत्रों के लिए प्रस्तुत की जाने वाली रिपोर्टों के अंशों को प्रकाशित और प्रसारित करने की एक प्रथा विकसित हुई है. मसलन भारत में 'जारी है' टाइगरों की तस्करी - BBC News हिंदी की सामग्री को देखा जा सकता है.

बीबीसी में प्रकाशित रिपोर्ट

जानवरों के संरंक्षण के लिए काम करने वाली संस्थाओं डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और 'ट्रैफिक' के मुताबिक भारत में बाघों की तस्करी अभी भी जारी है. वर्ल्ड वाइल्डलाईफ फंड और ट्रैफिक की रिपोर्ट 'रिड्यूस्ड टू स्किन एंड बोन्स' के अनुसार एशिया में पिछले 15 वर्षों के दौरान औसतन हर हफ्ते दो मरे हुए बाघ बरामद होते हैं.

रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2000 से लेकर 2015 के बीच एशिया में कम से कम 1,755 मरे और तस्करी के लिए जा रहे बाघ बरामद हुए हैं. चौंकाने वाली बात ये भी है कि इन 1,755 में से 540 भारत में बरामद हुए जो कुल संख्या का करीब 30% यानी सबसे ज्यादा है.

डब्लूडब्लूएफ के अनुसार दक्षिण भारत में बाघों की तस्करी के मामले सबसे ज्यादा दिखे जबकि मध्य भारत, खासतौर से मध्य प्रदेश, में बाघों के शव की बरामदगी में बढ़ोतरी दिखी. बाघों के जाने-माने एक्सपर्ट माइक पांडे ने बीबीसी को बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में बाघ की हड्डियों और खाल की कीमत लाखों डॉलर लगती है और इसका असर जंगलों में देखा जाता है.

उन्होंने कहा, "भारत में साल 2015 में ही 87 बाघों को तस्करी के लिए मारा गया. अगर यही हाल रहा तो समस्या बुरी तरह फैल जाएगी."

बाघों की तस्करी पर ये ताजा रिपोर्ट इसलिए भी अहम है क्योंकि कुछ दिन पहले ग्लोबल टाइगर फोरम और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने कहा था कि दुनिया में बाघों की तादाद 3,200 से बढ़ कर 3,850 हो चुकी है और बढ़ोतरी भारत में भी दिखी है. लेकिन 'प्रोजेक्ट टाइगर' या राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के पूर्व सदस्य नवीन रहेजा भी मानते हैं कि 'अगर तस्करी के लिए बाघों की हत्या न हो रही होती तो 2-3 वर्ष में भारत के बाघ दोगुने हो जाते.'

उन्होंने बताया, "भारत जैसे देश में, हजारों किलोमीटर के जंगल में 50, 100 या 200 गार्ड तैनात करने से बाघों का शिकार रुक नहीं सकता. ऐसे कई जंगल हैं जहां आज भी बाघों का शिकार हो रहा है और इसका मकसद सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजार है. लेकिन इस मामले में सिर्फ सरकार पर आरोप लगाना गलत है. दिक्कत विशालकाय जंगल हैं जहाँ इसे रोकने के लिए सबकी भागीदारी चाहिए".

इसके बावजूद कि भारत, नेपाल, रूस और भूटान में बाघों में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने इसे 'विलुप्त' होती जानवरों की प्रजाति में बरक़रार रखा है. बहरहाल, इस ताजा रिपोर्ट के अनुसार अब ज्यादा से ज्यादा उन बाघों का शिकार हो रहा है जिन्हें दक्षिण पूर्वी एशिया के कुछ देशो में 'टाइगर फॉर्मों' में पाला जाता है.

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