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शिवनारायण राजपुरोहित

छंटनी, वेतन में कटौती: एफसीआरए फंड, कर छूट समाप्त होने के बाद 'वित्तीय संकट' से जूझती सीपीआर

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च ने अपने कर्मचारियों की संख्या में 75 प्रतिशत की कटौती की है. फेलो और वरिष्ठ फेलो समेत इसके फैकल्टी सदस्यों के वेतन में 50 से लेकर 100 प्रतिशत तक की 'भारी कटौती' हुई है. सूत्रों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि यह थिंक टैंक आयकर विभाग के कर जांच के दायरे में आने के बाद से 'गंभीर वित्तीय संकट' का सामना कर रहा है.

सीपीआर को व्यापक रूप से एक 'मध्यमार्गी' थिंक टैंक के रूप में देखा जाता है जो सरकारी नीतियों की जांच-पड़ताल करती है. फरवरी में इस संस्था का विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम, यानी एफसीआरए लाइसेंस निलंबित कर दिया गया था. जिसके बाद से इसकी आय 75 प्रतिशत तक कम हो गई है. पिछले महीने इसे चैरिटेबल इंस्टिट्यूट के तौर पर दी जाने वाली टैक्स छूट भी वापस ले ली गई. यह संभवतः पहला थिंक टैंक है जिसकी फंडिंग में अनियमितताओं का आरोप लगने के कुछ महीनों बाद ही यह दोनों सुविधाएं छीन ली गईं.

थिंक टैंक ने अपने विदेशी योगदान का 25 प्रतिशत उपयोग करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय की अनुमति मांगी है. "हमें गृह मंत्रालय से कोई जवाब नहीं मिला है," एक सूत्र ने बताया. गृह मंत्रालय ने सीपीआर से कोई आवेदन प्राप्त होने के बारे में न्यूज़लॉन्ड्री के प्रश्न का भी उत्तर नहीं दिया.

थिंक टैंक के सूत्रों ने बताया कि विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए जरूरी एफसीआरए लाइसेंस के निलंबन और चैरिटेबल स्टेटस वापस ले लिए जाने के कारण इसके कई कार्यक्रम रुक गए हैं.

इसके अलावा, जो लोग अभी भी सीपीआर के साथ काम कर रहे हैं उनका कॉन्ट्रैक्ट तीन महीने के लिए ही आगे बढ़ाया जा रहा है, जबकि आमतौर पर एक साल का एक्सटेंशन होता है. सीपीआर के गवर्निंग बोर्ड के एक सदस्य ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, "(वेतन और नौकरियों में कटौती संबंधित) सभी निर्णय हमारे पास उपलब्ध सीमित अनुदान और संसाधनों के कारण लिए गए हैं."  

सीपीआर ने अपने लगभग 240 कर्मचारियों में से लगभग 180 की छंटनी कर दी है, जिनमें अधिकतर रिसर्च एसोसिएट, प्रोग्राम मैनेजर और फील्ड वर्कर थे. 1973 में स्थापित दिल्ली स्थित इस गैर-लाभकारी संस्था के एक फेलो ने बताया, "ज्यादातर लोगों ने सीपीआर छोड़ दिया है क्योंकि उन्हें पैसे नहीं मिल रहे थे, जबकि बाकी को या तो बेहतर नौकरी के अवसर मिले या वह उच्च शिक्षा के लिए विदेश चले गए."

एक अन्य फेलो ने कहा कि कर्मचारी "वित्तीय संकट से पूरी तरह अवगत थे" और छंटनी "गलत तरीके से नहीं की गई". उन्होंने कहा, "वह जानते थे कि सीपीआर उन्हें पैसे नहीं दे सकता, इसलिए वे अपनी मर्जी से चले गए." 

एक अन्य रिसर्चर ने कहा उन्होंने ऑफिस जाना बंद कर दिया है क्योंकि उनका प्रोग्राम "विदेशी योगदान" द्वारा वित्तपोषित था. "हमारा फंड बीएमजीएफ (बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन) से आया था. एफसीआरए निलंबन के बाद हम इसका उपयोग नहीं कर सकते. तो यह तय है कि प्रोग्राम आगे नहीं बढ़ सकता... मैं इस समय छोटी-मोटी कंसल्टेंट नौकरियों की तलाश में हूं. मुझे उम्मीद है कि फंड के प्रयोग पर कुछ स्पष्टता मिलने के बाद मैं अपना काम फिर से शुरू कर पाऊंगा," शोधकर्ता ने इस बात से इनकार किया कि उन्होंने औपचारिक रूप से इस्तीफा दे दिया है.

“हमारे सभी वित्तीय संसाधन बंद कर दिए गए हैं: एफसीआरए के माध्यम से मिलने वाली अंतर्राष्ट्रीय मदद के साथ ही घरेलू फंड भी क्योंकि चैरिटेबल इंस्टिट्यूट होने के कारण हमें टैक्स छूट मिलती थी. यह दोनों रस्ते बंद होने के बाद संस्था की अपने मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन के माध्यम से फंड जुटाने की क्षमता अवरुद्ध हो जाती है. इसलिए हम बहुत गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं. हमें उम्मीद है कि कानूनी मार्ग से हमें सहायता मिलेगी और हम वापस फंड जुटा पाएंगे," गवर्निंग बोर्ड के एक सदस्य ने कहा.

छंटनी और छोटे अनुबंध

पिछले सात-आठ सालों में सीपीआर एक ऐसे थिंक टैंक के रूप में उभरा है जहां युवाओं को नीति निर्माण और कार्यान्वयन की चुनौतियों पर चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. यह रिसर्च एसोसिएट या आरए "सीपीआर के अनुसंधान और नॉलेज बिल्डिंग की रीढ़ बन गए" जबकि फेलो और वरिष्ठ फेलो सहित फैकल्टी के सदस्य सार्वजनिक रूप से पहचाने जाने लगे.

2021-22 में 106 रिसर्च और प्रोग्राम स्टाफ सीपीआर के पेरोल पर थे. इन कर्मचारियों को वित्तीय संकट का बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा है.

"नौकरियां चली गई हैं क्योंकि हमारे फंड बंद हो गए हैं. घरेलू सहायता पर भी असर पड़ा है क्योंकि डोनर्स हमारी मदद करने से घबरा रहे हैं. (छंटनी किए गए कर्मचारियों में से) कुछ ही छोड़कर गए हैं क्योंकि उन्हें बेहतर अवसर मिले. यह एक वास्तविकता है जिसका हमें सामना करना होगा. जिस संगठन के फंड प्रतिबंधित हों उसे बहुत छोटे पैमाने पर काम करना पड़ता है," उपरोक्त फेलो ने कहा.

सीपीआर ने वेतन और मेहनताने पर 2021-22 में 2.78 करोड़ रुपए और 2020-21 में 2.52 करोड़ रुपए खर्च किए थे. 

"अनिश्चितता" और उच्च शिक्षा के कारण कुछ महीने पहले थिंक टैंक छोड़ चुके एक पूर्व शोधकर्ता ने कहा कि सीपीआर ने अनुबंधों को एक वर्ष के बजाय कुछ महीनों के लिए ही नवीनीकृत करना शुरू कर दिया है. "सीपीआर की जो बात मुझे पसंद है वह यह है कि यह पूरी तरह से स्वतंत्र है. यह कट्टरपंथी नहीं बल्कि मध्यमार्गी है. मुझे वहां स्वतंत्रता की अनुभूति हुई... यदि आप सरकार के साथ काम करने वाले थिंक टैंकों को देखते हैं, तो आपको पता चलता है कि वे सरकार की आलोचना करने से बचते हैं. उनकी आलोचना सुझावों से शुरू और उन्हीं पर ख़त्म होती है,'' उन्होंने कहा.

सीपीआर के एक अन्य फेलो ने कहा कि उन्होंने "स्वेच्छा से" 50 प्रतिशत कम वेतन लेने का फैसला किया है. उन्होंने कहा, "मैंने यह सुनिश्चित करने के लिए ऐसा किया कि रिसर्च स्टाफ को देने के लिए पैसे उपलब्ध रहें."

वेतन में कटौती समान रूप से नहीं की गई है. "कुछ ऐसे भी हैं जो बिना किसी वेतन के काम कर रहे हैं क्योंकि उनके पास कमाई के अन्य साधन हैं. तो यह सबके लिए समान नहीं है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि परियोजनाओं का वित्तपोषण कौन कर रहा है. यदि यह एक ऐसा कार्यक्रम है जो पूरी तरह से विदेशी योगदान के माध्यम से वित्तपोषित है, तो वेतन कटौती अधिक हो सकती है. और जो लोग राज्य सरकारों के साथ सर्विस अग्रीमेंट में हैं उनके लिए यह कम हो सकती है," एक अन्य स्रोत ने कहा.

रिसर्च पर प्रभाव

सूत्रों ने कहा कि सीपीआर ने अपना कामकाज काफी हद तक कम कर दिया है.

गवर्निंग बोर्ड के उपरोक्त सदस्य ने उन रिसर्च कार्यों को सूचीबद्ध किया जो "अधिक" प्रभावित हुए हैं: प्रशासनिक सुधार और क्षमता वृद्धि, शहरीकरण, वायु प्रदूषण, शहरी और ग्रामीण स्वच्छता, शहरी आवास, महिला श्रमबल भागीदारी, सामाजिक नीति बजट पर नज़र रखना, कार्यान्वयन चुनौतियों को समझना, वित्त और शासन पर पंचायतों और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों को प्रशिक्षण देना.

उन्होंने कहा कि सीपीआर का थिंक टैंक क्षेत्र में एक अद्वितीय स्थान है क्योंकि यह जमीनी स्तर से जानकारी इकठ्ठा करता है. उन्होंने कहा, "यह अन्य थिंक टैंकों से अलग है जो जमीनी स्तर पर काम करने में सक्षम नहीं हैं."

केंद्रीय मंत्रालयों, नीति आयोग और राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करने वाले सीपीआर की अनुदान दाताओं की सूची में कई घरेलू डोनर्स भी हैं. इनमें प्रमुख हैं: भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, जल शक्ति मंत्रालय, आंध्र प्रदेश और मेघालय सरकारें, और नीति आयोग.

हाल के समय में शोधकर्ताओं ने पीएम-पोषण योजना, स्वच्छता कर्मियों की सामाजिक सुरक्षा, कोयला बहुल राज्यों में ऊर्जा बदलाव, भारत के वेलफेयर सिस्टम, ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के आवंटन आदि का अध्ययन किया है.

2021-22 में इस थिंक टैंक ने 565 न्यूज़ आर्टिकल्स, 41 पालिसी ब्रीफ और रिपोर्ट, 37 जर्नल आर्टिकल्स, 15 वर्किंग पेपर और चार पुस्तकें प्रकाशित कीं; और 57 वार्ताएं, कार्यशालाएं और सेमिनार आयोजित किए.  

सीपीआर की एक पहल जो आईटी विभाग के निशाने पर आई वह था इसका पर्यावरण न्याय कार्यक्रम, जो एक कानूनी सशक्तिकरण संगठन नमति द्वारा वित्तपोषित था. इस पहल के तहत सीपीआर ने मुद्दों का अध्ययन किया और औद्योगिक, तटीय और खनन क्षेत्रों में पर्यावरण कानून के डिजाइन, संस्थागत कार्रवाई और सार्वजनिक भागीदारी पर सवाल उठाया. इसके तहत जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को पैरालीगल के रूप में प्रशिक्षित भी किया गया.

'अनियमितताएं' और 'अडानी लिंक'

आयकर नोटिस में मुख्य आरोप यह है कि सीपीआर ने अपने "ट्रस्ट के उद्देश्यों" का उल्लंघन करते हुए अपने फंड को एक्टिविजम और पर्यावरण संबंधी लिटिगेशन की ओर "मोड़ दिया". पिछले साल दिसंबर में जारी किए गए 33 पेज के नोटिस में आयकर विभाग ने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़-स्थित एनजीओ जन अभिव्यक्ति सामाजिक विकास संस्थान के आलोक शुक्ला के नेतृत्व में हुए खनन विरोधी "हसदेव आंदोलन" में "सीपीआर के कर्मचारियों की सीधी भागीदारी" थी. न्यूज़लॉन्ड्री के पास नोटिस की एक कॉपी है.

सीपीआर ने पर्यावरणीय न्याय के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था नमति के साथ अपने कार्यक्रम के हिस्से के रूप में जेएएसवीएस के साथ साझेदारी की है, जिसके तहत हसदेव क्षेत्र में पर्यावरण कानूनों के अनुपालन पर "अनुसंधान और शिक्षा" कार्यक्रम चलाया जाता है. हसदेव क्षेत्र तीन जिलों में फैला है और यहां कोयले के विशाल भंडार हैं. 

आईटी नोटिस में कहा गया है, 'यह स्पष्ट है कि 'नमति के पर्यावरणीय न्याय कार्यक्रम का उद्देश्य किसी विशिष्ट शोध या 'शैक्षिक' गतिविधि के बजाय मुकदमेबाजी और शिकायतें दर्ज करना है'.

नोटिस में कहा गया है कि 2016-17 और 2020-21 के बीच, सीपीआर को नमति से 11.55 करोड़ रुपए मिले थे.

हसदेव में अडानी समूह के खिलाफ खनन विरोधी प्रदर्शन किए गए थे. समूह के इस क्षेत्र में नौ कोयला ब्लॉक हैं. हसदेव बचाओ आंदोलन के संयोजक शुक्ला ने कोयला खनन के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया था.

केवल सीपीआर को ही परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा है. पिछले साल 7 सितंबर को, जिस दिन सीपीआर के कार्यालय का आईटी अधिकारियों द्वारा "सर्वेक्षण" किया गया था, उसी दिन पर्यावरण मामलों के वकील ऋतविक दत्ता द्वारा सह-स्थापित 'लीगल इनिशिएटिव फॉर फारेस्ट एंड एनवायरमेंट' के दिल्ली कार्यालय का भी "अडानी की परियोजनाओं के खिलाफ विदेशी धन का उपयोग" करने के लिए "सर्वेक्षण" किया गया था.

सीपीआर के गवर्निंग बोर्ड के उपरोक्त सदस्य ने आईटी विभाग के नोटिस में लगाए गए आरोपों से इनकार किया. "आपको अदालत में कोई भी जनहित याचिका नहीं मिलेगी जिसमें सीपीआर का नाम हो, जब तक कि किसी ने हमारे खिलाफ मामला दर्ज न किया हो. हम बिल्कुल भी ऐसा कोई काम नहीं करते हैं."

गैर-सरकारी संगठनों के साथ इसकी साझेदारी के सवाल पर उन्होंने कहा कि सीपीआर का काम "पूरी तरह से प्रभाव, कमी और कार्यान्वयन को समझने के क्षेत्र में है कि पर्यावरण कानूनों का अनुपालन क्यों नहीं किया जाता है". उन्होंने कहा, "अनुसंधान और शिक्षा" उद्देश्यों के लिए संस्था ने लगभग "30-40" गैर-सरकारी संगठनों के साथ साझेदारी की है.     

सीपीआर प्रमुख यामिनी अय्यर ने भी बोर्ड के सदस्य का समर्थन किया.

"सीपीआर ने हमेशा यह सुनिश्चित किया है कि उसकी गतिविधियां अनुसंधान और शिक्षा के संदर्भ में ही हों. एक संस्थान के रूप में इसे अपने उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान के लिए विश्व स्तर पर मान्यता मिली है. यह उस मान्यता और अपने काम की प्रकृति के लिए लड़ना जारी रखेगा. हमें विश्वास है कि हमारे काम की प्रकृति पर अधिकारियों के जो भी प्रश्न हैं, उन्हें शीघ्रता से हल किया जाएगा क्योंकि हम अपने लक्ष्य से नहीं भटके हैं," उन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा.

जेएसएवीएस के एक पदाधिकारी ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि 'पर्यावरण कानूनों का अनुपालन न करने' के मुद्दे पर सीपीआर के साथ उनका कंसल्टेंसी एग्रीमेंट था. 

'भविष्य अदालत के हाथ में'

सीपीआर के एक फैकल्टी मेंबर ने कहा कि थिंकटैंक "अपनी पुरानी शख्सियत की परछाईं भर" रह गया है, और राहत की उम्मीदें अदालतों पर टिकी हुई हैं.

"आयकर के छापे के बाद से सीपीआर के लिए समय कठिन रहा है लेकिन इतने दबाव के बावजूद यह संस्थान ढहा नहीं है. इसका बहुत बड़ा श्रेय यामिनी अय्यर को जाता है, जिन्होंने भारी तनाव के इस दौर में सहानुभूति और शांति के साथ इस संस्था का नेतृत्व किया. 50 साल पुरानी इस संस्था का भविष्य अब अदालतों के हाथ में है, और इस बात पर निर्भर करता है कि वह आज के भारत में एक स्वतंत्र थिंकटैंक को काम करते देखना चाहते हैं या नहीं. सीपीआर का बचे रहना जरूरी है, लेकिन अधिक महत्वूर्ण है एक छत के नीचे असमान, विविध, अलग-अलग आवाज़ों को स्थान देने में इसकी भूमिका की पुनः प्राप्ति, ऐसी आवाजें जो न सत्ता से डरती हैं न कारपोरेट नियंत्रण से," उन्होंने कहा. 

इंडियन कम्युनिटी एक्टिविस्ट नेटवर्क से जुड़े चेन्नई स्थित पर्यावरण कार्यकर्ता राजेश रामकृष्णन ने सीपीआर को देश का "सबसे सम्मानित" सिविल सोसाइटी संगठन बताया.

सरकारी कार्रवाई के संभावित कारण पूछे जाने पर उन्होंने दावा किया कि एनवायर्मेंटल गवर्नेंस और इसके उल्लंघनों पर सीपीआर की रिपोर्टों को "सरकार ने अच्छी नज़र से नहीं देखा" भले ही यह "थिंक टैंक कट्टरपंथी नहीं है".

"यह उन सभी सिविल सोसाइटी संगठनों को खत्म करने का एक तरीका है जो एनवायर्मेंटल गवर्नेंस के मुद्दे पर काम कर रहे हैं. वर्तमान सरकार ऐसी व्यवस्था चाहती है जहां पर्यावरणीय मंजूरी मिलना आसान रहे. सरकार द्वारा सुझाया गया एकमात्र समाधान है प्रतिपूरक वनीकरण, जो की इकोलॉजी के दृष्टिकोण से अत्यंत त्रुटिपूर्ण है."

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