
यूजीसी यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के नए नियमों को लेकर देशभर में विरोध देखने को मिला, खासकर उत्तर प्रदेश में जहां जनरल कैटेगरी के छात्र एकजुट नजर आए. इसी क्रम में बुधवार को दिल्ली यूनिवर्सिटी के सैकड़ों छात्रों ने भी जोरदार प्रदर्शन किया. इस दौरान हमने प्रदर्शन में शामिल छात्रों से बात की. हमने उन सभी छात्रों से भी बातचीत की, जो इन नियमों के विरोध और समर्थन में हैं.
बता दें कि ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026’ के तहत कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के खिलाफ जातीय भेदभाव रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए थे.
इन नियमों के तहत संस्थानों में हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमों के गठन का प्रावधान किया गया था. इसी बीच इन नियमों के खिलाफ छात्रों का विरोध बढ़ा और सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल भी दायर की गई. गुरुवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी द्वारा जारी नए नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी.
जनरल कैटेगरी के छात्रों की बढ़ती नाराजगी के बीच नियमों पर अंतरिम रोक लगाते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि नए नियमों में अस्पष्टता है और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने यह भी माना कि नियम कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करते हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है. मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी. फिलहाल, 2012 में यूजीसी द्वारा बनाए गए नियम ही प्रभावी रहेंगे.
कोर्ट के इस फैसले के बाद एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्रों ने भी विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया है. दिल्ली, लखनऊ और बनारस समेत कई शहरों से प्रदर्शन की तस्वीरें सामने आई हैं.
दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र विश्वविदित प्रताप सिंह कहते हैं, “यह कानून सामान्य वर्ग के छात्र, शिक्षक और कर्मचारियों के लिए मॉब लिंचिंग जैसा रेगुलेशन है. इससे उच्च शिक्षा संस्थानों में सामान्य वर्ग के छात्र और शिक्षक डर और सहमें हुए हैं. जब तक यह नियम वापस नहीं लिए जाते, हम सड़क से संसद तक अपना विरोध जारी रखेंगे.”
एक अन्य दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र आशुतोष कहते हैं, “यूजीसी की रिपोर्ट के ही मुताबिक पिछले पांच वर्षों में भेदभाव के मामलों में 118 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. हमें सोचना होगा कि इसके पीछे कौन लोग हैं. इन नियमों को खासतौर पर विश्वविद्यालयों में और सख्ती से लागू करने की जरूरत है. पढ़े-लिखे समाज में जातिवाद हमेशा प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिखता, लेकिन परोक्ष रूप से मौजूद रहता है. लोग आरक्षण की आलोचना करते हैं, जबकि सही मायनों में आरक्षण अब तक पूरी तरह लागू ही नहीं हुआ है.”
वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एन. सुकुमार कहते हैं कि मैं करीब 25 वर्षों से दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा रहा हूं, लेकिन आज भी कैंपस में भेदभाव देखने को मिलता है. मैं खुद भी इससे अछूता नहीं रहा हूं.”
देखिए पूरी वीडियो रिपोर्ट-
Newslaundry is a reader-supported, ad-free, independent news outlet based out of New Delhi. Support their journalism, here.