Get all your news in one place.
100’s of premium titles.
One app.
Start reading
Newslaundry
Newslaundry
Politics
अतुल चौरसिया

गोवा चुनाव और खनन उद्योग: 'यहां का लोहा कुछ लोगों के लिए सोना बन गया है'

उत्तर गोवा की सैंकलिम विधानसभा क्षेत्र से गुजरते हुए हम एक के बाद एक गांव छोड़ते हुए पिसुर्ले गांव पहुंचे. यह गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत का विधानसभा क्षेत्र है. रास्ते भर हमें सड़क के किनारे बड़ी संख्या में बेकार ट्रक खड़े नज़र आते हैं. 10 साल पहले इन्हीं ट्रकों का इस्तेमाल गोवा की लोहा खदानों से लौह अयस्क की ढुलाई के लिए होता था. ऐसे हजारों ट्रक इस इलाके में जंग खा रहे हैं. जब हम पिसुर्ले पहुंचे तब तक दोपहरी चढ़ चुकी थी. गरमी से पूरा इलाका तपने लगा था. ज्यादातर लोग घरों के भीतर थे. दोपहर के इस वक्त में गोवा के ज्यादातर लोग घरों के भीतर ही बिताते हैं. हम सीधा पिसुर्ले गांव के दूसरे सिरे पर जाकर रुके. जहां हम रुके वह एक बड़ी लोहे की खदान साइट थी.

यह खदान बीते 12 सालों से बंद पड़ी है. इस खदान की मालिक दामोदर मंगलजी एंड कंपनी लिमिटेड है. उत्तर गोवा की ज्यादातर लौह खदानें इसी तरह बंद पड़ी हैं. लेकिन खनन के चलते लाखों वर्ग मीटर के इलाके में जो गड्ढा बना है वह बारिश के पानी से भरकर एक अंतहीन झील का रूप ले चुका है. कई सुरक्षागार्ड इस झील के चारो तरफ जगह-जगह छप्पर डाल कर पहरा देते हैं. पूरी साइट को लोहे की कंटीली तारों से भी घेर दिया गया है.

इसी खदान साइट से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित नावेलिम-मायना गांव में हमारी मुलाकात एक ढाबे के मालिक से होती है. उनका नाम है शिवाजी परब. शिवाजी की कहानी अर्श से फर्श पर आने की कहानी है. एक समय में शिवाजी 20 से अधिक ट्रकों के मालिक थे. उनका लौह अयस्क की ढुलाई का कारोबार था. साल 2011 में शिवाजी ने अपने एक दोस्त से मोटा लोन लेकर आठ नए ट्रकों का नया बेड़ा खरीदा था. उनका कारोबार तेजी पर था. परिवार खुश था. रिश्तेदारों का तांता लगा रहता था. शिवाजी गांव के गरीब लड़कियों की शादी करवाते, मंदिर में उत्सव करवाते. अपने साथ काम करने वालों की खुले हाथ से मदद करते थे.

शिवाजी हमें बताते हैं, “वो ऐसा समय था जब मेरा काम बहुत अच्छा चल रहा था.” यह कहकर शिवाजी भावुक हो जाते हैं, “2012 के बाद मेरे साथ बहुत बुरा हुआ. एक समय मेरे गले में 10 लाख की सोने की चेन रहती थी. लाखों रुपए का ब्रैशलेट मैं पहनता था. इस इलाके के सारे थाने मेरी जेब में रहते थे. मेरे एक फोन पर सारे काम हो जाते थे. फिर मेरा ऐसा समय आया कि मेरी सारी प्रॉपर्टी बिक गई. मेरी बेटी की पढ़ाई तक अच्छे स्कूल में नहीं हो पा रही है. मुझे जेल जाना पड़ा और मेरी जमानत लेने के लिए कोई सामने नहीं आ रहा था. मैंने कोई अपराध नहीं किया था. आज मैं यह ढाबा चलाता हूं. पर मुझे अपने भगवान पर पूरा भरोसा है. उसने मुझे यहां तक पहुंचाया है, वही आगे भी मेरा ख्याल करेगा. अब मैं माइनिंग का नाम भी नहीं लेना चाहता.”

बेहद धार्मिक हो चुके शिवाजी के बारे में गांव के लोग भी बताते हैं कि वो गरीब लड़कियों की शादी, मंदिर में गणेश पूजा आदि में खुले हाथ से चंदा देते थे. लेकिन 2012 के बाद शिवाजी की जिंदगी में 180 डिग्री का बदलाव आ गया. सुप्रीम कोर्ट ने गोवा में लोहे के खनन पर रोक लगा दी. महज एक साल पहले शिवाजी ने अपने दोस्त से जो मोटी रकम नए ट्रक खरीदने के लिए ली थी, उनका भुगतान होना था. लेकिन खनन बंद हो गया. उधार किसी भी कीमत पर चुकाना था, लेकिन पैसे की आमद बंद हो गई. ट्रकों को बेचने की बात आई लेकिन इसमें भी एक पेंच था. शिवाजी के जैसे बड़ी संख्या में ट्रक मालिक थे जो अचानक से बेरोजगार हो गए थे. सबके ट्रक बिकने की नौबत आ गई थी. अचानक से गोवा के ग्रामीण इलाके में इतनी बड़ी संख्या में ट्रक बेकाम के हो गए कि उनकी रीसेल वैल्यू ही नहीं रह गई. कुछ बिके, कुछ पड़े रह गए. वो जंग खाते ट्रक जो हमें आते समय रास्ते में दिख रहे थे.

शिवाजी का दोस्त पैसा चुकाने का दबाव बनाने लगा. अपनी तमाम प्रॉपर्टी बेचकर उन्होंने उधारी चुकाने की कोशिश की. फिर भी पूरा नहीं हुआ. उसने शिवाजी के ऊपर केस दर्ज कर दिया. उनका एक चेक बाउंस हो गया था. 2019 में कोर्ट ने उन्हें जेल भेज दिया. जैसे-तैसे वो जमानत लेकर बाहर आए. उनकी जिंदगी पूरी तरह से बेपटरी हो चुकी थी. गांव में पुश्तैनी घर था. वहीं पर एक ढाबा खोल लिया. यह ढाबा ही अब उनकी रोजीरोटी का जरिया है. थोड़ा-बहुत उधार अभी बाकी है. एक बार फिर से भगवान को याद करते हुए शिवाजी कहते हैं, “वह भी चुक जाएगा. पर मेरे साथ जैसा हुआ वैसा किसी के साथ नहीं हो.”

कुडने, अमोना, सुरला, पाली, नावेलिम आदि एक के बाद एक गांव ऐसे हैं जहां बड़ी आबादी इन इलाकों में मौजूद लोहे की खदानों पर निर्भर थी. यहां के ग्रामीणों को लगता है कि खनन शुरू होगा तो उनकी जिंदगी बदल जाएगी. खनन का मुद्दा गोवा की राजनीति के केंद्र में है. क्योंकि राजनीति ही इसे कई तरीकों से हवा दे रही है. मसलन गोवा में चुनाव लड़ रही सभी पार्टियों ने अपने-अपने चुनावी घोषणापत्र में खनन फिर से शुरू करने का वादा किया है.

इसमें सबसे दिलचस्प वादा भारतीय जनता पार्टी का है. पार्टी के शीर्ष नेता और गृहमंत्री अमित शाह ने पोंडा विधानसभा क्षेत्र में एक कार्यकर्ता सम्मेलन में घोषणा की कि उनकी पार्टी अगर सत्ता में आई तो दोगुनी रफ्तार से माइनिंग शुरू होगी. उन्होंने कहा, “मैं आपसे कह रहा हूं, चुनाव के बाद हम पारदर्शी नीलामी की प्रक्रिया के तहत गोवा का खनन उद्योग दोगुने तफ्तार से शुरू कर देंगे.”

अमित शाह का दावा दिलचस्प इसलिए है क्योंकि भाजपा पिछले 10 साल से गोवा की सत्ता में है. फिर भी उनका कहना है कि अगली सरकार बनने के बाद वो खनन का काम शुरू करवाएंगे. लगभग इसी तरह के मिलते जुलते दावे गोवा में किस्मत आजमा रही दूसरी राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के भी हैं.

राजनीतिक दल जो बात अपने मतदाताओं को नहीं बता रहे हैं वह है खनन को बंद करने के लिए आया सुप्रीम कोर्ट का आदेश. सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ये दल किस तरह से माइनिंग के रास्ते से हटाएंगे, इस पर वो न तो कोई बात करते हैं, ना ही इससे निपटने का कोई रास्ता सुझाते हैं.

इसका तीसरा पहलू सबसे महत्वपूर्ण है. वो पहलू है पर्यावरण का, प्राकृतिक संसाधनों पर नागरिकों के हक का, प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर लंबे समय तक एक टिकाऊ खनन मॉडल स्थापित करने का. यानी सस्टेनेबल खनन का मॉडल. यह बात सर्वविदित है कि गोवा में लबे समय से अंधाधुंध खनन हो रहा था. यह राज्य की संपत्ति थी, इसका लाभ गोवा के नागरिकों को मिलना चाहिए था लेकिन सच्चाई यह थी कि गोवा के पूरे खनन कारोबार पर कुछ गिने-चुने व्यापारी घरानों का कब्जा था. वो मनमाने तरीके से खनन कर रहे थे. उनकी कमाई हजारों करोड़ रुपए में थी. और सरकार के पास इस कमाई का बहुत छोटा अंश जा रहा था.

यह कमाई अवैध तरीके से जारी थी. कम से कम 2007 के बाद से इन सारी कंपनियों की कमाई अवैध थी. क्योंकि इस साल सभी प्राइवेट कंपनियों की लीज की अवधि खत्म हो गई थी. इसके बावजूद ये धड़ल्ले से खनन करते रहे. उस प्राकृतिक संसाधन का जिसका हक राज्य के पास होना चाहिए था, जिसका लाभ उसके नागरिकों को मिलना चाहिए था, वह सारी कमाई आठ-दस बड़ी प्राइवेट खनन कंपनियां कर रही थीं.

गोवा के पर्यावरण, प्रकृति और खनन को बचाने की लड़ाई में लगी गोवा फाउंडेशन ने इस अवैध खनन को रोकने का काम अपने हाथ में लिया. 1986 में स्थापित हुई गोवा फाउंडेशन ने माइनिंग के मामले पर 1992 में ही काम करना शुरू कर दिया था. 2012 में उन्हें सफलता हाथ लगी, जब सुप्रीम कोर्ट ने खनन पर पूरी तरह से रोक लगाने का आदेश जारी किया.

गोवा फाउंडेशन के रीसर्च डायरेक्टर राहुल बसु हमें इस पूरे मसले से जुड़ा पांच सूत्रीय फार्मूला बताते हैं. वो कहते हैं, “खनन के मुद्दे को पांच बिंदुओं में समझना होगा. पहला, प्राकृतिक खनिजों के मालिक गोवा के आम नागरिक हैं. सरकार उनकी सिर्फ ट्रस्टी है. दूसरा, खनिज हमें विरासत में मिले हैं, हमने इन्हें बनाया नहीं है, इसलिए यह हमारी जिम्मेदारी है कि इसे आगे की पीढ़ियों को हस्तांतरित करें. तीसरा, अगर हम खनन करते हैं तो हमें जीरो लॉस सुनिश्चित करना होगा. चौथा, इससे प्राप्त धनराशि को गोवा के स्थायी कोश में रखना होगा, पूरी दुनिया में ऐसा ही होता है. पांचवां सभी खर्चों के बाद होने वाले मुनाफे को गोवा के नागरिकों में बांटा जाए.”

राहुल की इस बात से एक संदेश निकल कर आता है कि वो और उनका संगठन खनन को पूरी तरह से बंद करने के पक्षधर नहीं हैं. इनका मत है कि खनन वैध तरीके से हो, प्राकृति के साथ टिकाऊ संतुलन के साथ हो, उसका लाभांश नागरिकों को मिले न कि गिने-चुने व्यापारियों को और अपरोक्ष तरीके से राजनीतिक दलों और नेताओं को.

राहुल इस सस्टेनेबल यानी टिकाऊ खनन मॉडल के बारे में हमें बताते हैं, “खनन पर निर्भर व्यक्तियों को लाभ होना चाहिए. खनन से प्रभावित लोगों का लाभ होना चाहिए. गोवा की सरकार को लाभ होना चाहिए. गोवा के नागरिकों को लाभ होना चाहिए. आने वाली पीढ़ियों के लिए भी हमें कुछ बचाकर रखना है, ताकि उन्हें भी लाभ मिले और खननकर्ता कंपनी को 20 प्रतिशत तक लाभ दिया जा सकता है, लेकिन उन्हें बेरोक लूट की छूट नहीं दी जा सकती.”

गोवा में खनन का मुद्दा जटिल परतों में उलझा हुआ है. इसके तीन पक्ष हमारे सामने आते हैं. पहला पक्ष है गोवा की आम आबादी जिसकी आजीविका किसी न किसी तरीके से खनन पर निर्भर थी. इसका दूसरा पक्ष है पर्यावरण और उससे जुड़ी चिंताएं. तीसरा पक्ष है राजनीतिक दल और नेता. इसका चौथा पक्ष है वो चुनिंदा व्यापारिक घराने जो मोटा मुनाफा कमाते हुए, बिना किसी जावबदेही के बचे रहते हैं.

गोवा का खनन उद्योग इन चार पालों में बंटा हुआ है. इसमें तीसरे और चौथे पक्ष के हित आपस में जुड़े हुए हैं. इसीलिए एक पारदर्शी, वैध खनन का मॉडल दे पाने में सारे राजनीतिक दल अभी तक नाकाम रहे हैं.

(मेघनाद एस और लिपि वत्स के महत्वपूर्ण सहयोग के साथ)

Newslaundry is a reader-supported, ad-free, independent news outlet based out of New Delhi. Support their journalism, here.

Sign up to read this article
Read news from 100’s of titles, curated specifically for you.
Already a member? Sign in here
Related Stories
Top stories on inkl right now
One subscription that gives you access to news from hundreds of sites
Already a member? Sign in here
Our Picks
Fourteen days free
Download the app
One app. One membership.
100+ trusted global sources.