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शिवांगी सक्सेना

“हम श्मशान के बच्चे हैं”: वाराणसी के घाटों पर कोविड लाशों का क्रिया कर्म कर रहे मासूम

अजय चौधरी वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट पर लाशों को जलाने का काम करते हैं. उनकी उम्र केवल 12 वर्ष है. लाश के लिए लकड़ी लाने और चिता जलाने तक का सभी काम अजय अकेले करते हैं. हर लाश को जलाने के लिए उन्हें 500-600 रुपए मिल जाते हैं. अप्रैल में जब कोविड संक्रमण से होने वाली मौतें चरम पर थीं उस समय अजय करीब 50 कोविड लाशों को अग्नि दे चुके हैं.

न्यूज़लॉन्ड्री ने अजय से बात की. उन्होंने बताया, “वो आठ साल की उम्र से श्मशान घाट पर आते हैं. आज कल रोज़ तीन-चार लाशें जला लेते हैं. कोविड से डर लगता था पर जब देखा इतनी लाशें आ रही हैं तो डर चला गया और काम पर लग गए. हम लकड़ी ढ़ोकर लाते हैं और फिर भूसा भरकर चिता को आग लगाते हैं. लोग लाकर लाश को चिता पर रख देते हैं. बीच- बीच में भूसा डालकर चिता जल जाती है. इस पूरी प्रक्रिया में तीन घंटे का समय लगता है.”

जब हमारी मुलाकात अजय से हुई तब वो जल चुकी चिता को डंडे से मारकर जांच रहे थे कि लाश पूरी जल गई या नहीं क्योंकि कई बार अधजले अंगों को अपने हाथ से ठीक जगह रखकर पूरा जलाया जाता है.

बढ़ती कोविड लाशों ने बढ़ाया बच्चों का काम

अजय का जन्म बनारस में ही हुआ है. अजय ने हमें बताया, “कोविड से बढ़ती लाशों के चलते हरिश्चंद्र घाट के पास दो अतिरिक्त घाट बनाए गए हैं. इन दोनों घाटों पर भी बच्चे काम करने जाते हैं. जब से कोविड लाशें बढ़ी हैं बच्चों का आना भी बढ़ गया है. उनके पिता और भाई मोहन चौधरी भी श्मशान घाट पर लाश को जलाने का काम करते हैं. भाई 18 वर्षीय मोहन कम उम्र से श्मशान घाट पर काम कर रहा है. कुछ समय हरिश्चंद्र घाट पर काम करने के वह बाद छोटी उम्र में ही मोहन दशाश्वमेध घाट पर काम करने लगा. बीच-बीच में वो साड़ी और फर्नीचर की दुकान पर काम करता था लेकिन 16 साल की उम्र में वो वाराणसी में ही स्थित जगमबारी मठ में लाश को जलाने का काम करने लगा.”

हरिश्चंद्र घाट पर एक बिजली से काम करने वाला शवदाह गृह बना हुआ है. लेकिन कोविड लाशों की बढ़ती संख्या के चलते लाशों को जलाना भी शुरू किया गया. मोहन ने बताया, “शुरू में गंगापुर से एक लाश आई थी. किसी ने नहीं बताया था कि ये कोविड संक्रमित लाश है. लेकिन जब पता चला तब उसे कोई नहीं छू रहा था. समय के साथ लाशें बढ़ने लगीं. सभी को इलेक्ट्रिक शवदाह गृह में नहीं जलाया जा सकता था. इसलिए लोग कोविड संक्रमित शव को घाट पर ही जलाने लगे,"

मोहन कहते हैं, “वो बचपन से अपने पिता को श्मशान घाट पर काम करता देख रहे हैं इसलिए उसके अंदर से डर निकल चुका है. शुरुआत में नौ साल की उम्र से वो रोज़ श्मशान घाट आते हैं. घर पर चूल्हा नहीं है इसलिए खाने के लिए लकड़ी भी यहीं से ले जाते हैं. बचपन हमारा इसी लकड़ी के सहारे गुज़र गया.”

बगल में बैठा अजय भी कहता है कि इस लकड़ी को उठाकर बच्चे घाट पर बने एक कमरे में ले जाते हैं और इसी पर खाना पकाकर "पार्टी" करते हैं.

जग्गू और मन्नू की उम्र 11 वर्ष है. दोनों चिता तैयार करने के लिए लकड़ी ढोकर ला रहे थे. मन्नू के पिता झाड़ू लगाने का काम करते हैं और महीने के चार हज़ार रुपए तक कमा लेते हैं. वहीं मन्नू और जग्गू अन्य बच्चों के साथ घाट पर चिता के लिए लकड़ी लाने और चिता बिछाने का काम करते हैं. इसके लिए उन्हें 200 रुपए प्रति लाश मिल जाते हैं जो वो आपस में बांट लेते हैं. कोविड का समय अप्रैल के महीने में जब चरम पर था उस समय ये बच्चे दिन के 1000 -1500 रुपए कमा लेते थे. पश्चिम बंगाल के 12 वर्षीय शिव छठी कक्षा में पढते हैं और हरिश्चंद्र श्मशान घाट पर लकड़ी ढ़ोने का काम भी करते हैं. वो पिछले पांच साल से लाशों के बीच काम कर रहे हैं.

मन्नू बताते हैं, “घाट पर कोविड लाशें आनी बढ़ गई हैं. ऐसे में बच्चों के लिए काम भी बढ़ गया है. सभी काम तो बड़े नहीं कर सकते. हम यहां सालों से काम कर रहे हैं. सुबह से दस चक्कर लगा चुका हूं. एक हफ्ते पहले जब लाशों की कोई गिनती नहीं होती थी तब रोज़ शायद सौ चक्कर ऊपर-नीचे लगा लेते थे.”

मन्नू आगे बताते हैं, “वो खुद को "श्मशान का बच्चा" बोलते हैं. हम सभी बच्चे बहुत सालों से यहीं कमाते-खाते हैं. हमारा समय भी यहीं बीतता है. हम श्मशान के बच्चे हैं. हम बाबा की नगरी को छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे,"

स्कूल बंद होने के बाद से श्मशान पर ही समय बिताते हैं बच्चे

“अजय चौथी कक्षा में पढ़ते हैं लेकिन लॉकडाउन के बाद से कभी स्कूल नहीं खुला जिसके चलते उनका ज़्यादातर समय हरिश्चंद्र घाट पर ही गुज़रता है. ऑनलाइन पढ़ाई समझ नहीं आ रही है. बहुत बार इंटरनेट नहीं चलता या टीचर नहीं पढ़ाता. पढाई नहीं हो रही तो क्या करें? यहां पैसे भी कमा लेते हैं. जब से कोविड की दूसरी लहर शुरू हुई है घाट पर लाशों का ढ़ेर लगा हुआ है. रोज़ 100 लाशें आती हैं," अजय ने बताया.

अगर बच्चे काम नहीं करेंगे तो स्कूल की फीस कौन भरेगा?

इन सभी बच्चों का लीडर 17 वर्षीय गौरव है. गौरव बागची झारखंड का रहने वाला है लेकिन जन्म से वाराणसी का हरिश्चंद्र घाट ही उनका घर है. वो पिछले कई सालों से घाट पर काम कर रहा है और नौवीं कक्षा में पढता है. उन्होंने बताया, “अगर बच्चे काम नहीं करेंगे तो स्कूल की फीस नहीं दे पाएंगे, डोम समाज के कई बच्चे यहां मज़दूरी करते हैं. अगर काम नहीं करेंगे तो कमाएंगे कहां से? जो पैसा मिलता है उस से स्कूल की फीस भरते हैं. जो बच जाता है उस से पढ़ाई और घर का अतिरिक्त सामान आ जाता है,"

गौरव बताते हैं, “वह और बस्ती के अन्य बच्चे पास ही बने बंगाली तोला इंटर कॉलेज में पढ़ते हैं. लेकिन लॉकडाउन के बाद से पढ़ाई इंटरनेट के माध्यम से कराई जा रही है. ऐसे में डोम समुदाय के ये बच्चे दो साल से पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं.”

कौन है डोम जाति के ये लोग?

इस समुदाय के लगभग 35 परिवार शहर के मुख्य श्मशान हरिश्चंद्र श्मशान घाट के आसपास रहते हैं. शवों की बदबू और काला धुआं आसपास की हवा को भर देता है. डोम समुदाय दलितों की सबसे निचली श्रेणी के पायदान पर आते हैं. कुछ किसान और बुनकरों का काम कर लेते हैं लेकिन इनका मुख्य पेशा 'मौत की क्रिया' से जुड़ा है. ये तबका शवों को जलाकर अपनी आजीविका चलाता है. इनका दिन लाशों के साथ शुरू होता है और लाशों के बीच ही ख़त्म. वाराणसी में गंगा किनारे कई घाट बने हुए हैं. इसमें दो घाटों, हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका घाट पर सिर्फ अंतिम संस्कार किया जाता है. हालांकि कोविड के दौर में वाराणसी में कई जगह अस्थायी श्मशान घाट बना दिए गए हैं.

हिन्दू परम्पराओं के अनुसार वाराणसी भगवान शिव ने बसाया था. यह माना जाता है कि अंतिम संस्कार करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. वाराणसी में डोम जाति के लोग ये काम करते हैं. इस जाति का हर सदस्य अंतिम संस्कार की किसी न किसी प्रक्रिया से जुड़ा है. कोई अग्नि देता है, कोई लकड़ियों का प्रबंध करता है तो कोई चिता बनाता है. इन्हें लाश जलाने के लिए 600 रुपए तक मिल जाते हैं. इनके घर की स्थिति अच्छी नहीं होती इसलिए ये लोग बचपन से ही लड़कों को लाशों के इस व्यापार में घसीट देते हैं. महिलाएं या लड़कियां ये काम नहीं करतीं हैं.

33 वर्षीय विक्रम चौधरी डोम राजा हैं. डोम राजा समुदाय के मुखिया की तरह होता है. विक्रम ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, “घर में गरीबी के चलते बच्चों को कम उम्र से श्मशान के कामों में लगा दिया जाता है. कोविड की लाशों के बीच काम कर रहे ये बच्चे न तो मास्क पहनते हैं न कोई पीपीई किट. बस गमछे से मुंह ढक कर लाश को आहुति देते हैं.”

“उनके तीन बच्चे हैं. जो काम वो करते हैं, वो नहीं चाहते कि उनके बच्चे भी वही काम करें. लेकिन कोविड ने उनके बच्चों की शिक्षा पर प्रहार किया है. सब पढ़ाई ऑनलाइन हो गई है. फीस के साथ इंटरनेट में पैसा जा रहा है. पढ़ाई कुछ होती नहीं है. सारा पैसा बस पानी में बह रहा है," विक्रम कहते हैं.

"हमने अपनी ज़िन्दगी में इतनी लाशें कभी नहीं देखी. 15-20 दिन तो हर मिनट लाशें आ रही थीं. हम खुद डर गए थे. लाशें इतनी थीं कि लोग कम पड़ गए थे. इतने लोग कितना काम करेंगे? ऐसे में 12 साल के बच्चों को काम पर बुलाना पड़ा. इन बच्चों को लाश जलाने लाए परिवार पैसा देते हैं," विक्रम ने बताया.

हरिश्चंद्र घाट पर 11 से 15 साल के कई बच्चे काम करते हैं. लेकिन आज तक किसी ने उन्हें मना नहीं किया है. बता दें भारत में बाल श्रम (निषेध व नियमन) अधिनियम 1986 के तहत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से काम कराना गैरकानूनी है. बच्चों से ओवरटाइम या रात के समय काम कराना भी अपराध है.

बच्चों की सुरक्षा के मद्देनज़र इस रिपोर्ट में सभी बच्चों के नाम बदलकर लिखे गए हैं.

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