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कुमार प्रशांत

लिलिपुटियन नेताओं के बीच गुलीवर जैसे नेहरू

अंधा चकाचौंध का मारा

क्या जाने इतिहास बेचारा

साक्षी हैं उनकी महिमा के

सूर्य चंद्र भूगोल खगोल

कलम आज उनकी जय बोल …

आजादी के संघर्ष में आम आदमी के त्याग-बलिदान को दर्ज करते हुए ‘दिनकर’ ने जब यह कविता लिखी थी तब वे इतिहास की लघुता व असमर्थता को रेखांकित कर रहे थे. तब उन्हें यह अंदाजा भी कहां रहा होगा कि कभी उसी ‘बेचारे इतिहास’ को विदूषकों यानी जोकरों के हाथ का खिलौना भी बनना होगा और उन्हें भी अपने पन्नों पर दर्ज करना होगा.

हिस्ट्री चैनल पर अनुपम खेर का एक कार्यक्रम ‘लालकिले से गूंज’ देख कर यह तीखी अनुभूति भी हुई और एक अल्पबुद्धि व्यक्ति के दंभपूर्ण किंतु खोखले अभिनय को बर्दाश्त करने की पीड़ा भी हुई. समय व सार्वजनिक संसाधनों की ऐसी बेहिसाब बर्बादी, इतिहास के साथ ऐसा भद्दा सलूक और इतिहास व उसकी घटनाओं की ऐसी बेसिर-पैर की प्रस्तुति को राष्ट्रीय अपराध मानना चाहिए.

ऐसे आयोजनों के लिए एक खास किस्म की अंधता जरूरी होती है. मोदी-भक्तों में वैसी अंधता व वैसा उन्माद आज भी है, शायद यही प्रमाणित करने के लिए अनुपम खेर को मैदान में उतारा गया. मोदीजी की छवि चमकाने की चमचागिरी भरी कोशिशों के अब तक तीन मानक थे: एक, वह इंटरव्यू जो न्यूज नेशन के दीपक चौरसिया ने लिया था. दूसरा वह लाइव इंटरव्यू जो विज्ञापन करने तथा सिनेमा के लिए गीत लिखने वाले प्रसून जोशी ने अमेरिका में किया था. तीसरा वह जो अभिनेता अक्षय कुमार ने किया था आम खाने वाला! अनुपम खेर बहुत करके भी अब तक कहीं पहुंच नहीं पाए हैं, सो यह चौथा कार्यक्रम उन्होंने लपक लिया. इस तरह से यह क्षद्म दरबारी चतुर्भुज पूरा हुआ.

लेकिन जब नीयत भी गलत हो, तथ्य भी और पटकथा भी गलत हो तब न गलत इरादे छिप पाते हैं, न असत्य में सत्य की खुशबू पैदा हो पाती है. फिल्मी लोगों की दिक्कत कुछ अलग व ज्यादा ही बड़ी होती है. यहां चेहरा भर ही उनका होता है बाकी वे दूसरों के सहारे ही जिंदा होते हैं. अनुपम खेर के साथ भी यही त्रासदी हुई है. उनका इरादा भी अच्छा नहीं था, उनको जो लिखकर दिया गया था वह भी अच्छा नहीं था और जिस संग्रहालय में घूम-घूम कर वे यह प्रस्तुति कर रहे थे, वह संग्रहालय भी अच्छे मनोभाव का प्रतीक नहीं था.

हम जब भी इतिहास का इस्तेमाल करते हैं तब उसकी एक नजाकत भूल जाते हैं. इतिहास तथ्य व सत्य से बनता है, झूठ व बनावट से बिखर जाता है. झूठा इतिहास दरअसल इतिहास होता ही नहीं है. राजा-महाराजाओं, तानाशाहों, साम्यवादियों, दक्षिणपंथियों आदि सबने, अपनी-अपनी तरह का इतिहास बहुत लिखवाया लेकिन अंतत: वह सब रेत पर लिखी लिखाई ही साबित हुआ. देर-सवेर इतिहास ने सच की अपनी असली जमीन पकड़ ली.

अनुपम खेर दावा करते हैं कि लालकिले की प्राचीर से अब तक जितने प्रधानमंत्रियों ने देश को संबोधित किया है, उन सभी संबोधनों का विश्लेषण है यह कार्यक्रम! वे ऐसा कर पाते तो एक बड़ा काम होता लेकिन इसके लिए सिनेमाई ग्लैमर नहीं, इतिहास का गहरा अध्ययन, ऐतिहासिक घटनाक्रम की समझ, विश्लेषणों को जांचने-परखने का कौशल, और इन सबके साथ सत्य व तथ्यों के साथ ईमानदार तटस्थता चाहिए जो अनुपम खेर के पास न थी, न है.

यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रचार के लिए भी बनाया गया, तब भी इसे ज्यादा गहराई, ईमानदारी व ज्यादा तथ्यों की जरूरत थी. यह गलतफहमी आम तौर पर रहती है कि प्रचार का सत्य से लेना-देना नहीं होता. जबकि सच यह है कि असत्य कभी भी, कहीं भी सामने आता है तो उसे सत्य का आवरण ओढ़ना ही पड़ता है.

तो अगर लालकिले से प्रधानमंत्रियों के दिए गए भाषणों का विश्लेषण करना हो और आपको यह साबित करना हो कि सबसे खराब भाषण प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के थे और सबसे अच्छे, नगीने समान भाषण वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के होते हैं तब भी आप यह तथ्य छिपा तो नहीं सकते कि जवाहरलाल ने 1947 से 1963 के बीच 17 सालों तक लगातार लालकिले से देश को संबोधित किया.

दूसरा स्थान इंदिरा गांधी का है जिन्होंने 1966 से 1984 के बीच दो टुकड़ों में 16 बार और मनमोहन सिंह ने 2002 से 2014 तक लगातार 10 साल देश को संबोधित किया. इन तीन के बाद नरेंद्र मोदी का नाम आता है. 2014 से 2022 तक 9 साल वे देश को संबोधित कर चुके हैं. इसमें मैं उनका वह एक भाषण नहीं जोड़ रहा हूं जो गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में, नकली लालकिला बनवा कर, उस पर प्रधानमंत्री होने का स्वांग धरते हुए उन्होंने दिया था. यह किस साल की बात है? अनुपम खेर की रिसर्च टीम भी थोड़ा काम करे, इसलिए मैं यह उनके लिए छोड़ता हूं.

ये आंकड़े क्यों जरूरी हैं? दरअसल ये आंकड़े ही उन दौरों की नई-नई सच्चाइयां बयान करने लगते हैं. जब अनुपम खेर अपने कार्यक्रम में जवाहरलाल पर लगाए अपने मूर्खतापूर्ण आरोपों को पुष्ट करने के लिए, जवाहरलाल के किन्हीं दो भाषणों में से दो-एक पंक्तियां उठा लेते हैं, संदर्भ से काट कर उनका मनमाना अर्थ हमें बताने लगते हैं तब ये आंकड़े उपहास में खिलखिला उठते हैं. ये आंकड़े ही कहने लगते हैं कि इस तरह तो बाइबिल के यहां-वहां से वाक्यों को उठा-जोड़ कर आप यह भी साबित कर सकते हैं कि ईसा शैतान के पैरोकार थे.

पूरा संघ-परिवार इसी तरह तो यह प्रचारित करता रहता है कि महात्मा गांधी हिंसा को नीति के तौर पर इस्तेमाल करने की इजाजत देते थे. लोग खाने के अन्न की बर्बादी न करें व श्रम किए बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता है, जवाहरलाल की इन दो बातों का अनुपम ने जैसा फूहड़ व अशोभनीय इस्तेमाल किया है, उस पर कोई टिप्पणी करना खुद का अपमान करने जैसा होगा.

जवाहरलाल का उपहास करने में अनुपम इतने छिछले स्तर पर उतर जाते हैं कि यह विवेक भी नहीं रख पाते कि वे जिसकी बात कर रहे हैं वह कुर्सी पर बैठ जाने के कारण ही देश का प्रधानमंत्री नहीं था बल्कि अपने दौर का, विश्व का एक मान्य बौद्धिक व इतिहास की गहरी समझ रखने वाला व्यक्ति था. वह भारत की स्वतंत्रता के जनकों में सबसे अहम भूमिका निभाने वाला मोहक नायक था. हम उससे किसी मामले में (या हर मामले में) असहमत हो सकते हैं लेकिन उसे अपमानित कर, खारिज नहीं कर सकते. उसे खारिज करने की योग्यता पाने के लिए भी नरेंद्र मोदी, अनुपम खेर या व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के दूसरे दिग्गजों को बहुत-बहुत मेहनत करनी होगी.

67 सालों की कड़ी मेहनत से खड़ी की गई लोकतंत्र व विकास की इमारत में अपनी जगह हथिया लेने जैसी आज की बात उस समय नहीं थी. जवाहरलाल की आधी कहानी गुलामी से लड़ने और आधी कहानी आजाद हिंदु्तान के जन्म की पीड़ा से जुड़ी है. वह एक-एक ईंट जोड़ने, बुनियाद खोदने व नक्शा गढ़ने जैसी चुनौती की कहानी है. हम उस अभागे देश के लोग हैं जो रक्त की नदी तैर कर आजादी के दरवाजे पहुंचे थे. गृहयुद्ध की कगार पर खड़ा वह पगलाया देश जवाहरलाल के हाथ सौंपा गया था जिसका विभाजन हो चुका था.

गरीबी-सांप्रदायिकता-जातीयता-अंधविश्वास आदि से जिसकी आंतरिक ताकत चूक रही थी. उद्योग-धंधों का कोई मुकम्मल ढांचा नहीं था. फौज-पुलिस सब बिखरे हाल में थे. सैकड़ों सालों की गुलामी ने जिसका मन-मस्तिष्क गुलाम बना डाला था. ऐसे देश को बिखरने से बचाने-चलाने के लिए, कल तक जो नौकरशाही गुलामी को मजबूत करने में लगी थी, वही एकमात्र आधार था उनके पास. तन व मन दोनों से क्षत-विक्षत देश जिसे देख कर आशा व विश्वास पाता था, वह महानायक अभी-अभी गोलियों से बींध कर मार डाला गया था. इस पूरे काल में विफलताएं भी हुईं, गलतियां भी हुईं, बेईमानियां भी हुईं लेकिन इसी काल में देश को शनै:-शनै: खड़ा भी किया गया.

लालकिले से हुए जवाहरलाल के 17 भाषणों में आप वह सारा श्रम, वह सारी पीड़ा, वह सारी आस्था पहचान सकते हैं. इस कठिन ऐतिहासिक दौर को अनुपम दो भाषणों के, दो असंबद्ध वाक्यों में निबटा कर अपना एजेंडा तो पूरा कर लेते हैं लेकिन इस कोशिश में जवाहरलाल को नहीं, खुद को इतिहास का जोकर बना डालते हैं.

जवाहरलाल के पास लफ्फाजी और जुमलेबाजी का न अवकाश था, न गांधी उन्हें इसकी इजाजत देते थे. लोकतंत्र के मूल्यों व मिजाजों की उनकी जितनी समझ थी, विकास का जो पैमाना दुनिया भर में मान्य व प्रतिष्ठित था और जो उन्हें भी लुभाता था, उन सबको भारतीय जमीन पर बोने में उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा झोंक दी. हम उनसे सहमत-असहमत हो सकते हैं लेकिन उनकी सोच, योजना, प्रयत्न और नीयत से आंखें नहीं मूंद सकते. इन सारी चुनौतियों का, उनको पाने की कोशिशों का जिक्र वे लालकिले के अपने भाषणों में भी करते रहे. लेकिन अनुपम खेर की खैर नहीं रह जाती यदि वे उनका जिक्र भी कर देते. यह अनुपम अज्ञान अनुपम खेर के लिए वरदान साबित हुआ.

लालकिले की प्राचीर से यह संबोधन और वहां से उठती ‘जय हिंद’ की तीन पुकार जवाहरलाल की ही शुरू की हुई है जिससे उनका इतिहास-बोध समझा जा सकता है. इसे नागरिकों का समारोह बनाने तथा बच्चों की विशेष उपस्थिति की परंपरा भी उनकी ही शुरू की हुई है जो आज सिकुड़ते-सिकुड़ते आत्म-मुग्धता का प्रतीक मात्र रह गई है. आज यह याद दिलाना जरूरी-सा हो जाता है कि जिस जवाहरलाल पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने नेताजी सुभाष बोस को श्रेयहीन किया, ‘जय हिंद’ का यह नारा जवाहरलाल ने उनसे ही लिया था. अगर उन्होंने इसे लालकिले की प्राचीर से भारत की पुकार में बदल न दिया होता तो नेताजी का यह नारा इतिहास की गर्द में कहीं खो ही जाता.

प्रधानमंत्री बनते ही जवाहरलाल ने लस्त-पस्त देश को झकझोर कर उसे नया बनाने की दिशा में क्या-क्या किया, इसकी सूची कोई बनाए तो उसे आजाद भारत की कुंडली लिखने का अहसास होगा. राष्ट्रीय जीवन का कोई पहलू ऐसा नहीं था कि जिसे स्वतंत्रता का स्पर्श देने का प्रयत्न उन्होंने नहीं किया. आजादी की पौ फटते ही जवाहरलाल को कश्मीर हड़पने के साम्राज्यवादी षड्यंत्र का सामना करना पड़ा. वे जरा भी डगमगाते तो कश्मीर हाथ से गया ही था.

लेकिन जिन्ना को सामने कर जो ब्रिटिश-अमरीकी-रूसी दुरभिसंधि भारत के सामने खड़ी की गई थी, उसे धता बताते हुए, राजा हरि सिंह के साथ कश्मीर के भारत में विलय की जो संधि हुई, वह जवाहरलाल व उनकी सरकार की सबसे नायाब कूटनीतिक जीत की गाथा है. वह कश्मीर नासूर क्यों बन गया, इसे समझने के लिए जो प्रधानमंत्री व अनुपम खेर समान लोग ‘कश्मीर फाइल्स’ देखते हैं वे दया के पात्र हैं. लेकिन अनुपम करें भी तो क्या, उन्होंने न इतिहास पढ़ा है, न उसकी बारीकियों को समझा है. वे जिस प्रचार के लिए मैदान में उतारे गए हैं उसमें इतिहास की मूढ़ता बड़ा गुण मानी जाती है.

कश्मीर के षड्यंत्र की काट खोजने वाले जवाहरलाल ने तभी-के-तभी आजाद भारतीय समाज में विष समान देवदासी प्रथा की समाप्ति का एक्ट बनवाया. गांधी की हत्या का निजी व सामाजिक दर्द झेला. इतना ही नहीं, सांप्रदायिक ताकतें जिस तरह की अराजकता फैला कर सत्ता हथियाना चाहती थीं, उसे काबू में रखा और देश में किसी प्रकार की व्यापक अशांति भड़कने नहीं दी. यह उनकी प्रशासनिक क्षमता व निजी प्रतिबद्धता की मिसाल है. हम याद रखें कि यह तब की कहानी है जब चारणों की भीड़ पैदा नहीं हुई थी, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पैदा नहीं हुए थे, गुप्तचर एजेंसियों का आज जैसा जाल नहीं बिछा था.

देश के योजनाबद्ध विकास का नक्शा बनता रहे, इसलिए पंचवर्षीय योजनाओं की तस्वीर बनाने वाले योजना आयोग का गठन किया. विकास की मुहिम के प्रतीक स्वरूप दामोदर घाटी विकास परियोजना की शुरूआत की तथा 15 साल की आदिवासी किशोरी बुधनी मेझान के हाथों उसका प्रारंभ करवाया. संप्रभु गणतंत्र के रूप में भारत ने उसी काल में अपना संविधान अंगीकार किया और दुनिया ने जैसा वृहद चुनाव देखा नहीं था, वैसा प्रथम आम चुनाव करवाया. इसके लिए स्वायत्त चुनाव आयोग का गठन करवाया.

आधुनिक विज्ञान का केंद्र खड़ा करने के क्रम में खड्गपुर में भारत का पहला आईआईटी बनवाया. प्रेस की स्वतंत्रता और उसके अधिकारों की संवैधानिक व्यवस्था की. फिल्म्स डिविजन की स्थापना की. सिनेमा व रंगमंच को खुला आसमान व स्वतंत्र अस्तित्व दिया. सत्यजित राय, बिमल राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, राज कपूर आदि इसी दौर में खिले. सांस्कृतिक चेतना को आकार देने के लिए संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी तथा साहित्य अकादमी की स्थापना हुई. भाषावार प्रांतों को देश की भौगोलिक संरचना का आधार बनाया गया. आजादी मिलने के चौथे साल में ही भारत में पहले एशियाई खेलों का आयोजन करवाया. मिडडे मील की जिस योजना की आज इतनी चर्चा होती है उसका प्रारंभ तमिलनाडु के कांग्रेसी मुख्यमंत्री के कामराज ने 1956 में किया था जिसे जवाहरलाल का पूरा समर्थन मिला.

इसी दौर में आकाशवाणी और दूरदर्शन की स्थापना हुई. महात्मा गांधी की 90वीं जयंती पर राजस्थान से पंचायती राज की शुरुआत हुई. एक तरफ फिल्म इंस्टीट्यूट की स्थापना हुई तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्गुट राष्ट्रों का संगठन शीतयुद्ध से दुनिया को बाहर निकालने का विकल्प बना. इसी दौर में अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र की नींव रखी गई, परमाणु ऊर्जा का पहला केंद्र स्थापित किया गया. यह सब जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व के पहले दौर में ही साकार हो गया. लालकिला इन सबका साक्षी रहा. हां, इतना जरूर था कि तब लालकिला अपना ढोल पीटने का अड्डा नहीं था, देश को भरोसा देने व विश्वास में लेने का पवित्र स्थल था.

मोदी-दौर में पहुंचते ही अनुपम जिस तरह उपमाओं की बारिश करते हैं, क्या वैसी ही उदारता जवाहरलाल के लिए भी नहीं दिखा सकते थे? नहीं दिखा सकते थे क्योंकि यह उनके एजेंडा की हवा निकाल देता. इसलिए मोदीजी का बखान करते हुए अनुपम बड़ी चालाकी से लालकिला से बाहर निकल गए और मोदीजी की उन बातों-घोषणाओं की कसीदाकारी में लग गए जिनका लालकिले के भाषणों से कोई रिश्ता नहीं है.

अनुपम खेर ने हाथ में थमा दी गई पटकथा को पढ़ तो दिया कि नरेंद्र मोदी के भाषणों में आंकड़ों व तथ्यों की भरमार होती है, कि वे हर वर्ष अपनी पिछली घोषणाओं की प्रगति की जानकारी भी देते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री के लाल किले के भाषणों से अंश दिखा कर वे अपने इस दावे को प्रमाणित नहीं कर सके. वे ऐसा करते तो उनके लिए यह छिपाना कठिन हो जाता कि लालकिले के भाषणों को गलत आंकड़ों, आधारहीन घोषणाओं और अपनी वाहवाही का मंच बनाने का जैसा करतब मोदीजी ने दिखलाया है, वैसा जवाहरलाल की तो जाने ही दें, कोई दूसरा प्रधानमंत्री भी नहीं कर सका. यह शिफत सिर्फ एक ही प्रधानमंत्री के पास है.

अनुपम खेर ने लालकिले से गूंज तो उठाई लेकिन वे समझ नहीं सके कि वह गूंज कहीं और ही पहुंच गई.

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