
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को बजट पेश कर दिया. इस बार बजट में न तो कोई चौंकाने वाले ऐलान थे, न बड़े टैक्स कट, और न ही ऐसे बड़े सुधार, जो प्राइम टाइम पर छा जाएं. निर्मला सीतारमण का यह नौवां बजट उस अर्थव्यवस्था के अनुरूप दिखा, जो वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद काग़ज़ों पर ठीक-ठाक चल रही है और जिसे बड़े सुधारों से ज़्यादा स्थिर दिशा-निर्देशन की ज़रूरत है.
आज सुबह ज़्यादातर अख़बारों ने बजट को इसी नज़र से देखा.

द इकोनॉमिक टाइम्स के पहले पन्ने पर वरिष्ठ पत्रकार और अर्थशास्त्री स्वामीनाथन अय्यर ने इसे “अनरिमार्केबल” बताया. उन्होंने इसे निर्मला सीतारमण का “नौवां और सबसे कम रोमांचक बजट” करार देते हुए लिखा कि यह “भीड़ को लुभाने वाला नहीं, बल्कि आलोचकों की पसंद” है. अख़बार ने इस रिपोर्ट के साथ एक स्टाइलाइज़्ड पोस्टर भी छापा, जिसमें मोदी और सीतारमण को ट्रंप, शी जिनपिंग और पुतिन की भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि में दिखाया गया मानो सरकार वैश्विक अशांति से जूझ रही हो.
द फाइनेंशियल एक्सप्रेस ने भी इसी को आगे बढ़ाते हुए पहले पन्ने पर लिखा: “स्टेबिलिटी ट्रम्प्स स्पेक्टेकल” (स्थिरता ने तमाशे पर जीत हासिल की). इसके संपादकीय “रिफ़ॉर्म्स माइनस फ़ायरवर्क्स” में कहा गया कि सरकार ने जानबूझकर निरंतरता का रास्ता चुना है. अनिश्चित वैश्विक अर्थव्यवस्था में ये कदम भले ही बाज़ार या मतदाताओं को नहीं चौंकाएं, लेकिन ये वित्तीय विश्वसनीयता बनाए रखने और सुधारों की रफ़्तार को जारी रखने की कोशिश हैं.
बिज़नेस स्टैंडर्ड ने इसे “लॉन्ग-गेम बजट” कहा. अख़बार के संपादकीय ने सरकार के पब्लिक कैपेक्स पर भरोसे को रेखांकित किया ख़ासकर 12.2 लाख करोड़ रुपए के प्रस्तावित इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, नए फ़्रेट कॉरिडोर, हाई-स्पीड रेल और जलमार्गों को. इसे अल्पकालिक प्रोत्साहन के बजाय रणनीतिक, धैर्यपूर्ण और राज्य-नेतृत्व वाली विकास नीति बताया गया.
मिंट के पहले पन्ने ने इसे “सॉलिड स्टेट ड्राइव” कहा. अख़बार ने लिखा, “इस दशक में सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजटों ने भारत की वित्तीय नीति की विश्वसनीयता को दुरुस्त किया है. इस साल भी वही सतर्कता दिखती है. मसलन, 2027 में टैक्स-टू-जीडीपी अनुपात को मौजूदा वित्त वर्ष से कम मानकर चलना, बजट में एक तरह का अंतर्निहित वित्तीय बफ़र तैयार करता है. मामूली राजस्व लक्ष्यों से आगे निकलना, महत्वाकांक्षी लक्ष्यों से पीछे रह जाने से कहीं बेहतर है.”

टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने पर मोदी और सीतारमण को उथल-पुथल भरे समुद्र में जहाज़ पर सवार दिखाया गया सामने शार्क, एक विशाल हिमखंड और ट्रंप की लहर जैसी चुनौतियां. वहीं हिंदुस्तान टाइम्स की हेडलाइन थी: “रिफ़ॉर्म एक्सप्रेस टेक्स कर्तव्य पथ”.

द हिंदू के संपादकीय “क्रेडिबल एंड क्रेडिटेबल” ने भी यही सुर अपनाया. जहां पिछले साल का बजट इनकम टैक्स राहतों पर केंद्रित था, वहीं इस बार “बिग बैंग” उपायों से परहेज़ किया गया. इसके बजाय अख़बार ने इसे लक्षित सेक्टोरल कदमों का “बिखरा हुआ लेकिन ज़रूरी” तरीका बताया, जो भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक झटकों से भरी दुनिया के लिए ज़्यादा उपयुक्त है. संपादकीय का निष्कर्ष था: “यह और अधिक उथल-पुथल का समय नहीं है.”
हालांकि, कुछ अख़बारों ने संदेह भी जताया.

द टेलीग्राफ ने “शॉर्न ऑफ़ सरप्राइज़ेज़” शीर्षक वाले संपादकीय में घरेलू मैन्युफैक्चरिंग, एआई-आधारित सेक्टर्स, सेमीकंडक्टर्स, रेयर अर्थ्स और निर्यात प्रतिस्पर्धा पर ज़ोर देने की दलील को स्वीकार किया. लेकिन उसने सवाल उठाया कि क्या ये पूंजी-प्रधान उद्योग पर्याप्त रोज़गार पैदा कर पाएंगे. अख़बार ने युवाओं की बेरोज़गारी, असमानता और कमजोर उपभोग जैसे मुद्दों पर बजट की कमज़ोर प्रतिक्रिया की ओर भी इशारा किया. साथ ही, चुनावी राजनीति के संदर्भ में बंगाल पर बजट की “चुप्पी” को भी रेखांकित किया.

द इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय के मुताबिक समस्या सावधानी नहीं, बल्कि साहसिक सुधारों की कमी थी. अख़बार ने लिखा कि अशांत भू-राजनीतिक दौर में अर्थव्यवस्था संभालना, भावनाओं को संभालने जितना ही अहम है. उसने आक्रामक विनिवेश, पीएसयू में सरकारी हिस्सेदारी घटाने और सब्सिडी के युक्तिकरण जैसे कठिन फ़ैसलों से बचने के लिए सरकार की आलोचना की. खाद्य और उर्वरक सब्सिडी लगातार बढ़ने का ज़िक्र करते हुए सवाल पूछा कि मोदी सरकार “कब कठोर निर्णय लेगी”?
प्रमुख हिंदी अखबारों ने इसे लोकलुभावन घोषणाओं से दूर, वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच अर्थव्यवस्था को संभालने वाला बजट बताया. उनके अनुसार सरकार ने बड़े ऐलान करने के बजाय मौजूदा नीतियों को मजबूत करने पर ज़ोर दिया.
दैनिक जागरण ने बजट को “स्वदेशी कवच” बताते हुए “स्थिरता और सावधानी” वाला करार दिया. अख़बार के मुताबिक सरकार ने लोकलुभावन घोषणाओं से दूरी बनाए रखी और बुनियादी ढांचे, मैन्युफैक्चरिंग और आत्मनिर्भरता पर फोकस किया. जागरण ने लिखा कि यह बजट चुनावी शोर के बजाय अर्थव्यवस्था को संभालकर आगे ले जाने की कोशिश दिखाता है.
हिंदुस्तान ने बजट को “सुधार एक्सप्रेस” बताते हुए लिखा कि यह बजट आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य पाने की रणनीति का हिस्सा है.
जनसत्ता के अनुसार यह बजट “बिना आतिशबाज़ी वाला लेकिन सुरक्षित” है. अख़बार ने लिखा कि सरकार ने राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने को प्राथमिकता दी है और अमेरिकी टैरिफ तनाव और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच सरकार ने लोकलुभावन घोषणाओं से किनारा किया है.
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