
"कंगारू कोर्ट" जैसे कार्यक्रम चलाने पर मीडिया की आलोचना के बाद, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना ने मंगलवार को एक पुस्तक के विमोचन समारोह में कहा कि पत्रकारों की कहानियों को संपादकों के द्वारा दबा दिए जाने से उनका अपने पेशे के प्रति विश्वास खत्म होता है.
गुलाब कोठारी की किताब "गीता विज्ञान उपनिषद" के विमोचन पर अपने विचार रखते हुए जस्टिस रमन्ना ने कहा कि पत्रकार बड़ी मेहनत से और कई बार जोखिम उठाकर ख़बरों की रिपोर्टिंग करते हैं. जिन्हें कई बार संपादकों द्वारा "डेस्क पर ही दफन कर दिया" जाता है. उनके अनुसार यह एक पत्रकार के लिए हताश कर देने वाली बात होगी.
उन्होंने कहा, "यह एक सच्चे पत्रकार के लिए पूरी तरह से मनोबल गिराने वाला है. यदि वे बार-बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं और पेशे से विश्वास खो देते हैं, तो आप उन्हें दोष नहीं दे सकते."
वह आगे कहते हैं, "मीडिया को अपने प्रभाव और व्यावसायिक हितों को बढ़ाने के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल हुए बिना खुद को ईमानदार पत्रकारिता तक सीमित रखना चाहिए."
बता दें कि न्याय व्यवस्था में आने से पहले जस्टिस रमन्ना स्वयं भी एक पत्रकार रह चुके हैं.
अपने भाषण में सीजेआई ने स्वतंत्र पत्रकारिता के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने कहा, “तथ्यों को प्रस्तुत करना मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी है. खासकर भारतीय सामाजिक परिदृश्य में, जहां लोग अब भी छपी हुई बात को सच मानते हैं."
मीडिया कंपनियों की सामाजिक जिम्मेदारी और व्यापारिक हितों के विरोधाभास पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस रमन्ना ने कहा, "जब किसी मीडिया घराने के अन्य व्यापारिक हित भी होते हैं, तो उसके किसी बाहरी दबाव में आ जाने की संभावना बढ़ जाती है. अक्सर, स्वतंत्र पत्रकारिता के मूल्यों के ऊपर व्यापार के हित भारी पड़ते हैं. परिणामस्वरूप, जनतंत्र की हानि होती है."
उन्होंने अफसोस जताया कि गिने चुने भारतीय पत्रकारों को ही अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं और भारत में पुलित्जर के समकक्ष एक भी पुरस्कार नहीं है. मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "मैं सभी स्टेकहोल्डर्स (हितधारकों) से आत्मावलोकन करने का आग्रह करता हूं, क्यों हमारे मानकों को अंतरराष्ट्रीय सम्मान और मान्यता के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता है?"
गौरतलब है कि शनिवार को, मुख्य न्यायाधीश ने "कंगारू कोर्ट" चलाने के लिए मीडिया, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की आलोचना की थी. उन्होंने कहा था, "न्याय प्रदान करने से जुड़े मुद्दों पर गलत जानकारी और एजेंडा से चलने वाली बहस लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रही हैं."
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