
एनएल चर्चा के इस अंक में पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव के निधन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के पांचजन्य व ऑर्गनिज़र को दिए इंटरव्यू, जोशीमठ में होटलों और मकानों को गिराने का काम शुरू और लोगों का विरोध प्रदर्शन, पीएम मोदी ने वॉयस ऑफ़ ग्लोबल साउथ समिट में पहचान सुधार और सम्मान का मंत्र देने, डब्ल्यूएचओ द्वारा दो भारतीय कफ सीरपों के लिए जारी अलर्ट, सुप्रीम कोर्ट द्वारा धर्मांतरण के मुद्दे को राजनीतिक रंग न देने की बात, समान नागरिक संहिता पर सुप्रीम कोर्ट का बयान, ह्यूमन राइट वाच की रिपोर्ट भारत को लेकर की गई टिप्पणी, कंझावला मामले में आरोपियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया, अदार पूनावाला द्वारा कोवैक्स वैक्सीन को जल्द ही बूस्टरके लिए मंज़ूरी मिलने की पुष्टी, बॉम्बे हाईकोर्ट ने जॉनसन एंड जॉनसन बेबी पाउडर के उत्पादन और बिक्री पर एफडीए प्रतिबंध को रद्द करने, एस राजमौली की फिल्म आरआरआर के नाटू-नाटू गीत को गोल्डन ग्लोब अवार्ड और एनडीटीवी से सुपर्णा सिंह के इस्तीफे समेत अन्य विषयों का जिक्र हुआ.
चर्चा में इस हफ्ते वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी, हृदयेश जोशी और न्यूज़लॉन्ड्री के सह-संपादक शार्दूल कात्यायन शामिल हुए. संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.
अतुल चर्चा की शुरुआत में शरद यादव के राजनीतिक जीवन और समाजवादी राजनीति में उनके योगदान पर प्रकाश डालते हैं. अतुल कहते हैं, “समाजवादी आंदोलन में जिन बड़े नेताओं का नाम आता है उनमें मुलायम सिंह यादव लालू प्रसाद और राम विलास पासवान के साथ शरद यादव का नाम भी आता है. लेकिन शरद यादव का काम, किसी और नेता के मुक़ाबले एक मामले में काफी बड़ा था और वह था 1989-90 में मंडल आयोग की रिपोर्ट को वीपी सिंह की सरकार पर दबाव डालकर लागू करवाना. वह इतना बड़ा फैसला था जिसने हिंदी राज्यों की राजनीति को पलट कर रख दिया.”
शरद यादव के इस राजनीतिक जीवन के क्या कारण थे, इस पर वहीद नक़वी कहते हैं, “जो समाजवादी धड़ा था और समाजवादी धड़े के जितने दिग्गज थे शरद यादव का क़द किसी से कम नहीं था. शरद यादव की जो राजनीतिक प्रतिबद्धता और संगठनात्मक क्षमता थी वो किसी भी मामले में अपने समकक्षों से कम नहीं थी. लेकिन उनके जितने भी समकक्ष थे सभी लोगों ने अपना अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया था. चाहे वह पासवान जी हों लालू हों या नीतीश हों मुलायम सिंह यादव हों. शरद यादव हमेशा हाशिए पर रहे. वे हाशिए पर रहने वालों की राजनीति करते रहे और हाशिए पर रह गए.”
शरद यादव को याद करते हुए हृदयेश कहते हैं, “राजनीति कवर करते हुए मैंने शरद यादव को जितना जाना है, मैं कुछ क़िस्से बताना चाहता हूं. जब एकदलीय राजनीति का दौर ख़त्म हो गया राजीव गांधी के बाद, जब तक 2014 में नरेंद्र मोदी नहीं जीते, तब तक एक लंबा दौर रहा जब किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला. गठबंधन की सरकारें बनीं, शरद यादव ने बांड बनाने के लिए बड़ी भूमिका निभाई, जिसमें दक्षिणपंथी दल बीजेपी के साथ समता पार्टी और नीतीश कुमार वगैरह को जोड़ने की बात है.”
शरद यादव पर शार्दूल अपनी राय रखते हुए कहते हैं, “हमें यह नहीं भूलना चाहिए राजनीति में नेता सिर्फ जननेता नहीं होते, संगठन और समाज के मुद्दों से जुड़े होते हैं. वह अपने समय के प्रोडक्ट थे. मुझे लगता है कि जो एक तरह से भारतीय राजनीती कि पुरानी पीढ़ी थी, उसके लोग धीरे-धीरे हमारे बीच से जा रहे हैं. यह एक और क्षति है. कई लोगों को लग सकता है कि उनके जाने का कोई अर्थ नहीं है लेकिन हर किसी के जाने से कुछ ज़रूर कम होता है और उसका शोक सभी को मानना चाहिए.”
इसके अलावा मोहन भागवत के बयान और जोशीमठ पर भी विस्तार से बातचीत हुई. सुनिए पूरी चर्चा-
टाइम कोड
00:00:00 - 00:11:11 - इंट्रो, हेडलाइंस व ज़रूरी सूचनाएं
00:11:14 - 00:25:20 - शरद यादव का निधन
00:25:21 - 00:51:53 - जोशीमठ आपदा
00:51:55 - 00:56:55 - सब्सक्राइबर्स के मेल
00:57:00 - 01:33:07 - मोहन भागवत का बयान
1:33:11 - सलाह और सुझाव
पत्रकारों की राय, क्या देखा, पढ़ा और सुना जाए
शार्दूल कात्यायन
अतुल चौरसिया की अमूल पर ग्राउंड रिपोर्ट
हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला
हृदयेश जोशी
नंदा देवी पर अज्ञेय की कविताएं
क़मर वहीद नक़वी
जॉर्ज ऑरवेल की किताब एनिमल फार्म
डैरेन एसमग्लू और जेम्स रॉबिंसन की किताब व्हाई नेशंस फेल
अतुल चौरसिया
पाञ्चजन्य में छपा मोहन भागवत का इंटरव्यू
नेटफ्लिक्स सीरीज ट्रायल बाय फायर
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