
एनएल चर्चा के 186वें अंक में पंजाब कांग्रेस में जारी उठापटक, कांग्रेस में कन्हैया कुमार की एंट्री, कांग्रेस नेतृत्व पर कपिल सिब्बल के सवाल, प्रधानमंत्री का अमेरिकी दौरा और गोरखपुर में एक कारोबारी की पुलिस पिटाई से हुई मौत हमारी चर्चा के मुख्य विषय रहे.
इस बार चर्चा में बतौर मेहमान पत्रकार और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष उमाकांत लखेड़ा और स्वतंत्र पत्रकार साक्षी जोशी शामिल हुईं. साथ में न्यूज़लॉन्ड्री के सहसंपादक शार्दूल कात्यायन ने भी चर्चा में हिस्सा लिया. संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस ने किया.
चर्चा की शुरुआत पंजाब में मची राजनीतिक अफरा तफरी से हुई. मेघनाद सवाल करते हैं कि पंजाब के नवनियुक्त मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का आगामी चुनावों में कितना प्रभाव रहेगा?
इस सवाल का जवाब देते हुए उमाकांत लखेड़ा कहते हैं, “यह भारतीय जनता पार्टी वालों से कांग्रेस ने सीखा है कि अगर सत्ता विरोधी रुझान है किसी मुख्यमंत्री के खिलाफ तो उसे फ़ौरन चलता कर दो और उसकी जगह किसी और को लीडर बना दो जिसके चेहरे पर चुनाव लड़ा जा सके. आम धारणा थी कि अगर पांच साल बाद नई सरकार का चेहरा भी आप कैप्टन अमरिंदर सिंह को रखते हैं तो बहुत सारे लोग पार्टी का साथ छोड़ देंगे."
वे आगे कहते हैं, “झगड़ा तब शुरू हुआ जब नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया, दोनों ही एक दूसरे के धुर विरोधी थे. नवजोत जब से कांग्रेस में शामिल हुए हैं, उनके और कैप्टन अमरिंदर के संबंध अच्छे नहीं रहे. अब जो यह घालमेल हुआ कि किसे मुख्यमंत्री बनाया जाए. इसमें नवजोत सिंह सिद्धू की पसंद का भी ध्यान रखना था और कांग्रेस आलाकमान को पता था कि अगर सिद्धू को मुख्यमंत्री बनाया गया तो कैप्टन अमरिंदर सिंह सीधे बग़ावत का एलान कर देंगे. इसलिए यह बीच का रास्ता निकाला गया और चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया गया.”
कपिल सिब्बल के बयान, कांग्रेस नेतृत्व और पार्टी की वर्तमान राजनीति पर साक्षी जोशी कहती हैं, "यह बात सच है कि कांग्रेस के पास पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है हालांकि उनके पास अंतरिम अध्यक्ष मौजूद है और कपिल सिब्बल उस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता है. उन्हें इस चीज़ का सम्मान करना चाहिए. यह जो लोकतंत्र का इस्तेमाल कर लोग कुछ भी बोले जा रहे हैं उससे किसी का फ़ायदा नहीं हो रहा. फ़ायदा कर रहे हैं तो सिर्फ विरोधी दलों का. अगर वास्तव में आपको अपने संगठन से प्यार है तो आप इंटरनल मीटिंग्स में इन मुद्दों को उठाएं और उन्हें सुलझाने का प्रयास करें."
वे कहती हैं, "कांग्रेस और बीजेपी में फ़र्क़ यही है कि बीजेपी के नेताओं के भी अपने हित हैं, महत्वकांक्षाएं हैं मगर उनके लिए संगठन ज़्यादा बड़ा होता है, जबकि कांग्रेस में जितने भी लीडर्स हैं उनकी महत्वकांक्षाएं सबसे ज़्यादा बड़ी हैं, उनके कामकाज में उनके लिए संगठन उतना महत्व नहीं रखता है."
इस मुद्दे पर शार्दूल कहते हैं, "नेता केवल और केवल अपना नफा-नुकसान देखते हैं. बहुत ही कम होते हैं जो आइडियोलॉजी आदि के हिसाब से चलते हैं, और वह अधिकतर असफल नेता रहते हैं. भाजपा में स्वर आज इसलिए नहीं उठ रहे क्योंकि तमाम बेइज़्ज़ती के बाद भी सत्ता में उन्हें भागीदारी मिल रही है. कांग्रेस के साथ ऐसा नहीं है, कांग्रेस एक स्टैण्डर्ड पार्टी भी नहीं है. कांग्रेस अलग अलग स्वार्थों को संभालने वाली पार्टी है इसलिए चुनाव में नुकसान देखते हुए भी लोग अपने अपने हितों की रक्षा कर रहे हैं."
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00-1:50 इंट्रो
1:50-6:35 हेडलाइन
6:40 - 8:20 ज़रूरी सूचना
8:21 - 44:16 पंजाब की राजनीति और कांग्रेस का नेतृत्व संघर्ष
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पत्रकारों की राय, क्या देखा, पढ़ा और सुना जाए.
शार्दूल कात्यायन
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