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प्रतीक गोयल

सॉलिसिटर जनरल द्वारा अदालत में याचिका देने वालों पर अभियोजन चलाने की पैरवी

17 मई 2013 की रात, छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के एडसमेटा गांव के लोग बीजपंडुम त्यौहार मनाने के गांव के गमम मंदिर के बाहर इक्कट्ठा हुए थे. मंदिर के बाहर करीब 50 से 60 लोग आग के पास नाच कर उत्सव मना रहे थे. इसी दौरान गांव के तीन युवक पानी पीने के लिए तालाब की तरफ गए. तालाब पहुंचने पर वहां मौजूद सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन ने युवकों पर हमला कर दिया. एक युवक के हाथ में बन्दूक की संगीन घोप दी गई. तीनों युवक चिल्लाते हुए वहां से भागे तो सीआरपीएफ ने उत्सव मना रहे ग्रामीणों पर गोलीबारी शुरू कर दी.

इस गोलीबारी से गांव वालों के बीच मची अफरा-तफरी मच गई. इस वारदात में सात ग्रामीण मौके पर ही मारे गए और पांच लोग घायल हुए, मृतकों में से चार नाबालिग थे. एक घायल की छह महीने बाद मृत्यु हो गयी. इसके अलावा सीआरपीएफ के एक कांस्टेबल की भी इस घटना में सिर पर गोली लगने से मौत हो गयी थी.

इस घटना के बाद सीआरपीएफ ने उत्सव मना रहे आदिवासियों को हथियारों से लैस नक्सली बता कर अपनी कार्रवाई को उचित ठहराया था. बताया गया कि नक्सलियों ने पहले हमला किया, और उन्होंने आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई की थी. लेकिन जब कई हलकों में इस घटना की आलोचना हुई तो तत्कालीन भाजपा सरकार ने इस घटना की जांच कराने के लिए मई 2013 में जस्टिस वीके अग्रवाल की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग का गठन किया. आयोग ने अपनी जांच की रिपोर्ट करीब आठ साल बाद 2021 में जारी की. कमीशन की रिपोर्ट से साफ हो गया कि एडसमेटा में सुरक्षाबलों द्वारा मारे गए ग्रामीण नक्सली नहीं थे. रिपोर्ट के अनुसार उस रात वहां मौजूद लोग नक्सली नहीं थे, न ही वे हथियारों से लैस थे और न ही उन्होंने सुरक्षाबलों पर हमला किया था.

लेकिन इसके बावजूद भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का सुप्रीम कोर्ट में दिया हालिया बयान न सिर्फ एडसमेटा में हुई घटना को सुरक्षाबलों के लिहाज़ से जायज़ ठहराता है, बल्कि ऐसी घटनाओं के खिलाफ अदालत का दरवाज़ा खटखटाने वालों को ही दोषी करार दिए जाने की पैरवी करता है.

गौरतलब है कि एडसमेटा हत्याकांड के बाद 2013 में, छत्तीसगढ़ निवासी और आदिवासियों के अधिकार के लिए लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता डिग्री प्रसाद चौहान ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सीबीआई जांच कराने हेतु एक याचिक दायर की थी. उनकी याचिका के आधार पर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच सीबीआई द्वारा कराने के आदेश दिए. फिलहाल इस मामले की जांच चल रही है. इसी मामले की सुप्रीम कोर्ट में चल रही एक सुनवाई के दौरान मेहता ने सीबीआई की तरफ से पैरवी करते हुए 21 नवम्बर को कहा कि वे याचिकाकर्ता चौहान के खिलाफ अदालत में अभियोजन चलाने का आवेदन करेंगे. मेहता का कहना है कि चौहान ने याचिकाकर्ता के रूप में एडसमेटा मामले में झूठी जानकारी दी है.

सॉलिसिटर जनरल मेहता ने अदालत में कहा कि ऐसे मामलों में गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) अपने ही लोगों को फैक्ट फाइंडिंग करने भेजते हैं. एनजीओ के दल अपनी रिपोर्ट पूर्व निर्धारित निष्कर्षों के आधार पर बनाते हैं, और फिर इन्हीं फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्टों के आधार पर अदालतों में याचिका दायर करते हैं, जिसे अदालतें भी दाखिल कर लेती हैं. मेहता कहते हैं कि एडसमेटा घटना की सीबीआई जांच के मामले में भी ऐसा ही हुआ है.

मेहता ने 2014 में गृह मंत्रालय द्वारा दाखिल एक जवाबी हलफनामे के आधार पर कहा कि माओवादियों के फ्रंटल ऑर्गनाइज़ेशन्स (आगे रहने वाला संगठन) मानवाधिकार संगठनों और एनजीओ के रूप में काम करते हैं, और कानूनी प्रक्रियाओं से बचने के लिए अलग-अलग नामों से काम करते हैं. माओवादियों और सुरक्षाबलों के बीच हुयी मुठभेड़ों में जब माओवादियों की मौत हो जाती है तो ऐसे ही मानवाधिकार संगठन अपनी फैक्ट फाइंडिंग टीम भेजते हैं, जो अपनी जांच में सुरक्षाबलों को ही गलत ठहराती हैं. सॉलिसिटर जनरल का दावा था कि इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है.

मेहता ने याचिकाकर्ता चौहान को लेकर कहा कि वे चौहान के खिलाफ अभियोजन चलाने का आवेदन करेंगे, क्योंकि नक्सलवाद से सख्ती से निपटना ज़रूरी है. उनका कहना था कि चौहान की एडसमेटा से सम्बंधित याचिका पर भी उसी तरह की कार्यवाई होनी चाहिए, जो सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार की गोमपाड़ नरसंहार से जुडी याचिका के मामले में हुआ था.

गोपमाड़ की घटना

साल 2009 में दंतेवाड़ा जिले के गोमपाड़ गांव में 16 आदिवासियों की हत्या की गई थी. ग्रामीणों का कहना था कि सुरक्षाबलों और सलवा जुडूम ने उन पर हमला किया था, जिसमें 16 लोगों की मौत हो गयी थी. इस घटना को लेकर हिमांशु कुमार और अन्य 12 ग्रामीणों ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की स्वतंत्र जांच कराने के लिए याचिका दायर की थी. जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एएम खानविलकर और जेबी पारडीवाला की बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया था. सरकार की तरफ से हिमांशु के खिलाफ आवेदन भी दाखिल किया गया कि उन्होंने झूठी व मनगढ़ंत कहानियां बनाईं. अदालत ने कुमार पर पांच लाख का जुर्माना लगाया था.

गौरतलब है कि इस आदेश के बाद गोमपाड़ के 16 निवासी दिल्ली आये थे और उन्होंने मीडिया के सामने घटना का हालिया बयान भी दिया था.

हालांकि चौहान के खिलाफ मेहता की इन दलीलों और उनके आवेदन पर अदालत ने कहा कि अगर वह ऐसा कोई भी आवेदन करते हैं, तो अदालत उसे खारिज कर देगी.

आयोग और सॉलिसिटर जनरल के बीच का विरोधाभास

मेहता द्वारा अदालत में कही गई बातें न सिर्फ 17 मई की रात को मारे गए ग्रामीणों की मौत का मज़ाक उड़ाती हैं, बल्कि जस्टिस अग्रवाल द्वारा की गई न्यायायिक जांच की भी अवहेलना करती हैं, जिसे छत्तीसगढ़ के मौजूदा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने विधानसभा में भी पेश किया था. इस मामले में मृतक आदिवासियों के परिवारों को छत्तीसगढ़ सरकार ने  पांच-पांच लाख का मुआवजा देने की भी घोषणा की थी.

गौरतलब है कि जस्टिस अग्रवाल कमीशन की रिपोर्ट स्पष्ट रूप से कहती है कि सुरक्षाबलों ने आग के इर्द-गिर्द मौजूद गांव वालों को गलती से नक्सली समझ लिया था और घबराहट में उन पर गोलियां चला दी थी. जांच में पाया गया कि मृत और घायल हुए व्यक्तियों में से कोई भी नक्सली संगठन से नहीं जुड़ा था. राज्य प्रशासन भी मृतकों और घायल ग्रामीणों को नक्सली नहीं मानता, वरना शासन की ओर से उन्हें मुआवजा नहीं दिया जाता. सुरक्षा दल के सदस्यों का यह दावा भी झूठा था कि आग के पास मौजूद लोगों ने पहले हमला किया, और फिर उन्होंने आत्मरक्षा में उन पर गोलियां चलाईं. रिपोर्ट कहती है कि हमला सुरक्षाबलों ने ही किया था, वे गांव के लोगों को नक्सली समझ बैठे और घबराहट में उन पर गोलियां चलाने लगे .

सीआरपीएफ के कांस्टेबल देव प्रकाश की मृत्यु पर रिपोर्ट कहती है कि उनकी मृत्यु माथे पर गोली लगने से हुई थी, और उन्हें लगी गोली उनके ही किसी साथी की बंदूक से चली थी. वहां मौजूद ग्रामीणों के पास हथियार नहीं थे, तो उन्हें इस्तेमाल करने सवाल ही नहीं उठता बल्कि  सीआरपीएफ के सुरक्षबलों के पास ऐसे हथियार ज़रूर थे जो गोली लगने जैसी चोट पहुंचा सकते हैं. रिपोर्ट ने सुरक्षाबलों के उस कथन  को भी खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने आदिवासियों के पास ‘भरमार बंदूकों’ की होने की बात कही थी.

रिपोर्ट यह भी कहती है कि अगर ये मान भी लिया जाए कि आदिवासियों के पास दो ‘भरमार बन्दूकें’ थीं और उन्होंने उसका इस्तेमाल भी किया था, तब भी उससे होने वाले ज़ख्म सिर्फ छर्रों के होते न कि गोली के, और कांस्टेबल की मृत्यु गोली लगने से हुयी थी. न्यायिक जांच की रिपोर्ट ने सुरक्षाबलों द्वारा अपने ऊपर आदिवासियों द्वारा सभी दिशाओं से 30 मिनट तक अंधाधुंध गोलियां चलाने के दावे को भी सिरे से खारिज कर दिया, और कहा कि अगर ऐसा होता तो सुरक्षाबल टुकड़ी से सिर्फ एक नहीं, बल्कि बहुत से लोग आहत होते. अलबत्ता, इस बात के प्रमाण ज़रूर हैं कि सुरक्षबलों ने गांव वालों पर 44 राउंड फायर किये, जिसमें आठ लोगों की मौके पर ही मौत हो गयी थी.

आयोग ने सुरक्षाबलों के एडसमेटा में नक्सलियों के इकट्ठा होने की ‘खुफिया जानकारी’ मिलने के दावे को भी खारिज किया है. रिपोर्ट कहती है कि सुरक्षाबल दल की अगुवाई कर रहे  अधिकारियों ने माना कि उनके पास नक्सलियों के एडसमेटा के पास इकट्ठा होने जैसी कोई भी खुफिया सूचना नहीं थी. इससे साफ हो जाता है कि उनके पास ऐसी कोई पुख्ता जानकारी नहीं थी जिससे यह कहा जा सके कि आग के अगल-बगल नक्सली जमा हुए थे.

एडसमेटा मामले की सीबीआई की जांच की याचिका दायर करने वाले चौहान से जब हमने बात की तो वह कहते हैं, "सॉलिसिटर जनरल साहब को यह सब कहने से पहले सीबीआई की जांच तो  पूरी होने का इंतज़ार करना चाहिए था. हमने पीपल यूनियन ऑफ़ सिविल लिबर्टी, जिसे जेपी नारायण ने शुरू किया था, की ओर से इस मामले की फैक्ट फाइंडिंग की थी. फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट बनाने के बाद हमने मानवाधिकार आयोग, एससी-एसटी कमीशन आदि अनेकों सरकारी विभागों व संस्थानों से इस मामले की जांच की गुहार लगायी थी. जब इन महकमों से कोई मदद नहीं मिली तब हमने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. क्या एक भारतीय नागरिक के रूप में हमारा इतना भी अधिकार भी नहीं है कि देश के आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए एक याचिका भी दायर न कर सकें? जस्टिस वीके अग्रवाल आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि गांव में मारे गए या मौजूद लोग नक्सली नहीं थे, और सुरक्षाबलों ने घबराहट में उन पर हमला कर दिया था. इसके बाद भी सॉलिसिटर जनरल साहब ऐसी बात कर रहे हैं तो वो आदिवासियों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता का परिचय दे रहे हैं, लेकिन मुझे हमारे देश के संविधान और न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है और जीत सच की ही होगी.”

बस्तर में आदिवासियों के लिए वकालत करने वाली वकील शालिनी गेरा कहती हैं, "इस मामले की न्यायिक जांच हो चुकी है. जिसमें साफ हो गया कि यह एक फर्जी एनकाउंटर था. सिर्फ यही नहीं इसके पहले भी कई फर्जी एनकाउंटरों का सच उजागर हो चुका है. और वह इसलिए हो पाया क्योंकि अलग-अलग फैक्ट फाइंडिंग टीमें मौके पर जाकर जानकारी लेकर आई थीं. सारकेगुड़ा में भी यही हुआ था. जब ऐसा कुछ होता है तो राजनीतिक संगठन, एनजीओ, आदिवासी समाज की फैक्ट फाइंडिंग टीमें आदि सभी जाते हैं. सिविल सोसाइटी का मतलब ही यही है कि जब ऐसे हादसे हों, तो सच का पता करें और उसे अंजाम तक ले जाएं. अगर सरकार की खामियों को सिविल सोसाइटी नहीं बताएगी तो कौन बताएगा? अगर सिविल सोसाइटी को ही निशाना बनाया जाएगा, तो फिर पीड़ित लोगों की बात कौन आगे रखेगा?”

बस्तर में  ही काम करने वाली एक अन्य मानवधिकार वकील बेला भाटिया कहती हैं, "यह बड़ी  हैरानी की बात है कि सॉलिसिटर जनरल के पद का व्यक्ति ऐसी गैर-ज़िम्मेदाराना और संवेदनहीन बात कर रहा है. उन्होंने जो कहा उससे अंदेशा लगाया जा सकता है कि वे चाहते हैं कि सिविल सोसाइटी मूकदर्शक बनी रहे और किसी भी गलत बात पर कोई आपत्ति न जताये. वो वहां गलत नीयत देख रहे हैं जहां नीयत साफ है. वो बहुत खतरनाक तरीके से सामाजिक सरोकार और सामजिक कामों  को आपराधिक बता रहे हैं. क्या हम जान सकते है कि लोकतंत्र का उनके लिए क्या मतलब है? क्या इस देश के पढ़े-लिखे नागरिकों को गलत बातों के खिलाफ आवाज़ उठाकर, उसे कानून के सहारे सही अंजाम तक ले जाने का भी हक़ नहीं है?”

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